डर से आज़ादी: वास्तु डराता नहीं, समझाता है
देखिए, वास्तु पर पहला सवाल यही आता है — “सर, कहीं कुछ ग़लत तो नहीं हो जाएगा?” यही डर सबसे बड़ी समस्या है। यह डर शास्त्र ने नहीं दिया। बाज़ार ने दिया.
कोई भी प्राचीन ग्रंथ उठा लीजिए — मानसार, मयमतम, समरांगण सूत्रधार. उनमें कहीं नहीं लिखा कि कोई दिशा आपका विनाश कर देगी. वे किताबें नाप, अनुपात, सूर्य की गति और भार के संतुलन पर हैं. यानी वास्तुकला की किताबें.
अपने शरीर से समझिए. नाभि शरीर का केंद्र है. उसे हम ढककर, बचाकर रखते हैं — उस पर वज़न नहीं रखते. घर का केंद्र, यानी ब्रह्मस्थान, भी वैसा ही है. उस पर कोई भार नहीं आना चाहिए — न सीढ़ी, न शौचालय, न भारी सामान. बस इतना.
रायपुर के एक डॉक्टर मेरे पास आए. किसी ने कहा, शौचालय दक्षिण-पश्चिम में है, तोड़ना पड़ेगा. हमने कुछ नहीं तोड़ा. बस घर का ग्रिड-नक़्शा बनाया. पता चला शौचालय दक्षिण-पश्चिम में था ही नहीं — वह दक्षिण-दक्षिण-पश्चिम में था, जो शौचालय के लिए शुभ दिशा है. हमने सिर्फ़ टाइल का रंग हरे से पीला करवाया — उस ज़ोन के अनुसार. इतना काफ़ी था.
आज एक छोटा-सा प्रयोग कीजिए. घर के बीचोंबीच खड़े होइए और मोबाइल का कम्पास खोलिए. उत्तर-पूर्व का कोना देखिए. वहाँ क्या है — भारी अलमारी, सीढ़ी, या शौचालय? अगर वहाँ खुली और हल्की जगह है, तो आप ठीक हैं.
वास्तु से हर चीज़ ठीक नहीं होती. मैं दावा नहीं करूँगा. लेकिन जो होता है, वह डराकर नहीं होता.
इस स्वतंत्रता दिवस पर एक आज़ादी यह भी लीजिए — डर से आज़ादी.
– रोहित खंडेलवाल, वास्तुविद् एवं वास्तु सलाहकार, आयतन वेद, रायपुर, छत्तीसगढ़
अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं। इससे सहमत या असहमत होना पाठकों का व्यक्तिगत अधिकार है। यह लेख जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से है, यह किसी भी प्रकार की पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।