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UNESCO की सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल हुआ गुजरात का गरबा, दुनिया भर में बढ़ा भारत की लोकसंस्कृति का गौरव….

साल 2023 में मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान, नवरात्रि के इस पारंपरिक नृत्य को UNESCO ने दी विशेष जगह

by desk

नई दिल्ली।भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर एक और पहचान मिली, जब गुजरात के पारंपरिक गरबा नृत्य को वर्ष 2023 में UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया। यह उपलब्धि गुजरात ही नहीं, बल्कि पूरे भारत की लोककला और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए गौरव का विषय बनी।

क्या है गरबा और क्यों है खास?

गरबा गुजरात का पारंपरिक लोकनृत्य है, जिसे विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान माँ दुर्गा और आदिशक्ति की आराधना के लिए किया जाता है। इस नृत्य में लोग पारंपरिक वेशभूषा पहनकर गोल घेरे में तालियों और संगीत की लय पर नृत्य करते हैं। पारंपरिक रूप से गरबा में मिट्टी के घड़े में जलते दीपक का भी विशेष महत्व रहा है, जो जीवन और दिव्य शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

 पीढ़ियों से चली आ रही है गरबा की परंपरा

गरबा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह धार्मिक आस्था, सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी गीतों, संगीत, नृत्य और पारंपरिक रीति-रिवाजों के माध्यम से इस कला को संरक्षित किया जाता रहा है। समय के साथ गरबा गुजरात से निकलकर देश के अन्य हिस्सों और विदेशों में भी लोकप्रिय हुआ है।

UNESCO की सूची में शामिल होने का क्या है महत्व?

UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में किसी परंपरा का शामिल होना उसकी सांस्कृतिक महत्ता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाता है। इससे उस परंपरा के संरक्षण, प्रचार-प्रसार और आने वाली पीढ़ियों तक उसके हस्तांतरण के प्रति जागरूकता बढ़ती है।

गरबा को मिली यह पहचान भारत की विविध लोककलाओं और परंपराओं के वैश्विक महत्व को भी रेखांकित करती है।

 नवरात्रि में गरबा का विशेष महत्व

नवरात्रि के नौ दिनों में गुजरात सहित देश के कई राज्यों में गरबा और डांडिया रास के आयोजन होते हैं। इन कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में लोग भाग लेते हैं और भक्ति गीतों के साथ माँ दुर्गा की आराधना करते हैं। आज गरबा धार्मिक आस्था के साथ-साथ भारत की सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक उत्सव का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

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