IN-SPACe चेयरमैन के लॉन्च व्हीकल से जुड़े बयान के बाद कर्मचारी संगठनों ने मांगा स्पष्टीकरण, इसरो चेयरमैन वी. नारायणन ने कहा- संस्थान का निजीकरण नहीं हो रहा
नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) में निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी को लेकर कर्मचारियों के बीच चिंता सामने आई है। विवाद की शुरुआत IN-SPACe के चेयरमैन पवन कुमार गोयनका के उस बयान के बाद हुई, जिसमें उन्होंने कहा था कि भविष्य में लॉन्च व्हीकल बनाने का काम निजी क्षेत्र या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों द्वारा किया जाएगा और इसरो की भूमिका अलग होगी।
इस बयान के बाद इसरो से जुड़े नौ कर्मचारी संगठनों ने अंतरिक्ष विभाग से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की। कर्मचारी संगठनों को आशंका है कि अगर लॉन्च व्हीकल और सैटेलाइट निर्माण जैसे कामों में इसरो की प्रत्यक्ष भूमिका लगातार कम होती गई, तो इससे संस्थान में इन-हाउस काम, नए पदों पर भर्ती और कर्मचारियों के प्रमोशन के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।
कर्मचारी संगठनों का कहना है कि उनकी आपत्ति निजी उद्योग या अंतरिक्ष क्षेत्र में व्यावसायीकरण के खिलाफ नहीं है। उनकी मुख्य चिंता यह है कि निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने और इसरो की अपनी निर्माण क्षमता को कम करने के बीच स्पष्ट नीति सामने आनी चाहिए।
50 लॉन्च व्हीकल का लक्ष्य
बेंगलुरु स्पेस एक्सपो 2026 के दौरान इसरो चेयरमैन वी. नारायणन ने कहा कि भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधार पिछले कुछ वर्षों से जारी हैं। उन्होंने बताया कि सरकार निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स को अंतरिक्ष क्षेत्र में आगे बढ़ाने पर जोर दे रही है।
नारायणन के मुताबिक, भविष्य में भारत को एक साल में करीब 50 लॉन्च व्हीकल तक पहुंचने का लक्ष्य रखना होगा। यह काम केवल इसरो के दम पर संभव नहीं है, इसलिए निजी उद्योग की भागीदारी जरूरी होगी।
उन्होंने स्पष्ट किया कि इसरो का निजीकरण नहीं किया जा रहा है। इसरो सरकारी संगठन है और आगे भी अपने वैज्ञानिक एवं अंतरिक्ष अभियानों पर काम करता रहेगा। उनका कहना है कि अंतरिक्ष क्षेत्र का पूरा इकोसिस्टम बड़ा करने के लिए इसरो और उद्योग जगत को मिलकर काम करना होगा।
कर्मचारियों को किन बातों की चिंता?
कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि लॉन्च व्हीकल और सैटेलाइट निर्माण में इसरो की भूमिका घटने से रिसर्च के बाद होने वाले प्रयोगात्मक कार्यों और इन-हाउस तकनीकी गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।
उनके अनुसार इसका प्रभाव वैज्ञानिक और तकनीकी कर्मचारियों के अलावा प्रशासनिक, खरीद, स्टोर, गुणवत्ता, सुरक्षा और औद्योगिक कैडर पर भी पड़ सकता है। संगठनों को यह भी आशंका है कि नियमित भर्ती और स्वीकृत पदों की संख्या प्रभावित होने से युवा वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए इसरो में करियर के अवसर कम हो सकते हैं।
कर्मचारी संगठनों ने यह भी सवाल उठाया है कि अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी बढ़ाने के लिए ऐसी स्पष्ट नीति होनी चाहिए, जिसमें इसरो की मूल क्षमताओं और राष्ट्रीय रणनीतिक हितों की सुरक्षा सुनिश्चित हो।
चेयरमैन ने कर्मचारियों को दिया भरोसा
वी. नारायणन ने कर्मचारियों की चिंताओं पर कहा कि यदि किसी कर्मचारी या संगठन की जायज चिंता है तो उसे दूर करना प्रबंधन की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि इसरो अपने करीब 20 हजार कर्मचारियों के साथ लगातार संवाद करता रहा है और कर्मचारियों की समस्याओं पर बातचीत की जाएगी।
हालांकि, कुछ कर्मचारी संगठनों से जुड़े लोगों का दावा है कि चेयरमैन और कर्मचारी संघों के बीच नियमित बैठकें पिछले कुछ वर्षों में पहले जैसी नहीं रही हैं। इसी वजह से कर्मचारियों के एक वर्ग को आधिकारिक स्पष्टीकरण की जरूरत महसूस हो रही है।
IN-SPACe ने भी दी सफाई
IN-SPACe चेयरमैन पवन कुमार गोयनका ने भी स्पष्ट किया कि अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका का मतलब इसरो के महत्व में कमी आना नहीं है। उन्होंने कहा कि चंद्रयान, गगनयान, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन, चंद्रमा पर मानव मिशन, शुक्र और मंगल अभियानों सहित कई बड़े प्रोजेक्ट इसरो के सामने हैं।
गोयनका ने यह भी बताया कि करीब 12,500 वैज्ञानिकों में से लगभग 125 वैज्ञानिकों के संगठन छोड़ने की जानकारी है। उनके अनुसार यह संख्या कुल वैज्ञानिकों की करीब एक फीसदी है और इसे असामान्य नहीं माना जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इसरो के सभी प्रमुख प्रोजेक्ट तय कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ़ रहे हैं। उनके मुताबिक यह इसरो और निजी उद्योग के बीच प्रतिस्पर्धा का मामला नहीं, बल्कि दोनों के मिलकर भारत को वैश्विक अंतरिक्ष क्षेत्र में मजबूत बनाने का प्रयास है।
फिलहाल, इसरो में निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी को लेकर बहस जारी है। कर्मचारियों की मांग है कि सरकार और अंतरिक्ष विभाग इस दिशा में स्पष्ट नीति और इसरो की भविष्य की भूमिका को लेकर स्थिति साफ करें।