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केदारनाथ में कचरे का संकट गहराया: 5 महीने में निकला 50 टन कचरा, टूटे सारे पुराने रिकॉर्ड…

केदारनाथ धाम में भारी श्रद्धालु भीड़ के बीच 5 महीनों में 50 टन कचरा निकला, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है, पर्यावरणविदों ने जताई गंभीर चिंता

by desk

उत्तराखंड के प्रसिद्ध तीर्थस्थल केदारनाथ धाम में इस साल श्रद्धालुओं की रिकॉर्डतोड़ भीड़ के साथ-साथ एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या भी सामने आ रही है — कचरे का लगातार बढ़ता अंबार। हाल ही में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, बीते पांच महीनों के दौरान धाम क्षेत्र से करीब 50 टन कचरा एकत्र किया जा चुका है, जो अब तक के सारे पिछले रिकॉर्डों को पीछे छोड़ चुका है।

बढ़ती भीड़ और उसका पर्यावरणीय असर

हर साल लाखों श्रद्धालु केदारनाथ धाम की यात्रा करते हैं, लेकिन इस बढ़ती संख्या का सीधा असर हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि किस तरह तीर्थयात्रा के बढ़ते दबाव के चलते संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है। प्लास्टिक की बोतलें, खाने-पीने के पैकेट, कपड़े और अन्य गैर-जैविक कचरा इस समस्या का बड़ा हिस्सा माना जा रहा है।

प्रशासन और स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका

इस चुनौती से निपटने के लिए स्थानीय प्रशासन और कई स्वयंसेवी संगठनों की टीमें लगातार सफाई अभियान चला रही हैं। ये टीमें धाम परिसर और यात्रा मार्ग पर नियमित रूप से कचरा एकत्र करने और उसके उचित निस्तारण का काम कर रही हैं। हालांकि, यात्रियों की संख्या में हो रही लगातार बढ़ोतरी के अनुपात में यह प्रयास नाकाफी साबित हो रहा है, जिससे कचरा प्रबंधन एक बड़ी और जटिल चुनौती बनता जा रहा है।

पर्यावरणविदों की चिंता और सुझाव

पर्यावरण विशेषज्ञों ने इस स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि केदारनाथ जैसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में सतत पर्यटन (Sustainable Tourism) नीति को अपनाना अब समय की मांग बन गया है। उनका सुझाव है कि यात्रियों की संख्या को नियंत्रित करने, प्लास्टिक के इस्तेमाल पर सख्त पाबंदी लगाने, और कचरा प्रबंधन के लिए आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करने जैसे कदम उठाए जाने चाहिए, ताकि इस पवित्र तीर्थस्थल की प्राकृतिक सुंदरता और पारिस्थितिकी को संरक्षित रखा जा सके।

आगे की राह

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और भी विकराल रूप ले सकती है। प्रशासन को श्रद्धालुओं के बीच जागरूकता फैलाने के साथ-साथ कचरा निस्तारण की स्थायी व्यवस्था बनाने की दिशा में गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है।

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