Home » Blog » जयपुर की महारानी गायत्री देवी ने इंदिरा गांधी को दी राजनीतिक चुनौती, फिर पहुंचीं तिहाड़ जेल; जानिए पूरी कहानी

जयपुर की महारानी गायत्री देवी ने इंदिरा गांधी को दी राजनीतिक चुनौती, फिर पहुंचीं तिहाड़ जेल; जानिए पूरी कहानी

by desk

जयपुर की महारानी गायत्री देवी सिर्फ अपने शाही जीवन और खूबसूरती के लिए ही मशहूर नहीं थीं। उन्होंने भारतीय राजनीति में भी अपनी मजबूत पहचान बनाई और लगातार तीन बार लोकसभा चुनाव जीतकर कांग्रेस और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी की। 1975 में जब देश में आपातकाल लगा, तो गायत्री देवी भी गिरफ्तार होकर तिहाड़ जेल पहुंचीं। उनकी गिरफ्तारी आज भी भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित अध्यायों में गिनी जाती है।

राजघराने से राजनीति तक पहुंचीं गायत्री देवी

गायत्री देवी का जन्म 23 मई 1919 को कूच बिहार के राजघराने में हुआ था। उनका विवाह जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय से हुआ और वह जयपुर की महारानी बनीं।

लेकिन आजादी के बाद गायत्री देवी ने सिर्फ राजघराने की पहचान तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने लोकतांत्रिक राजनीति में कदम रखा और स्वतंत्र पार्टी से चुनाव लड़ा।

1962 में उन्होंने जयपुर लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर तहलका मचा दिया। उनकी जीत बेहद बड़े अंतर से हुई थी। इसके बाद उन्होंने 1967 और 1971 में भी लोकसभा चुनाव जीते। इस तरह जयपुर की जनता के बीच उनकी राजनीतिक पकड़ लगातार मजबूत होती गई।

इंदिरा गांधी से क्यों हुआ टकराव?

गायत्री देवी और इंदिरा गांधी की राजनीतिक विचारधारा में काफी अंतर था। गायत्री देवी स्वतंत्र पार्टी की नेता थीं और कांग्रेस की कई नीतियों की आलोचना करती थीं।

1960 और 1970 के दशक में इंदिरा गांधी सरकार ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण और पूर्व राजघरानों को मिलने वाली प्रिवी पर्स व्यवस्था खत्म करने जैसे बड़े फैसले लिए। गायत्री देवी इन नीतियों की मुखर विरोधी थीं। 1971 में प्रिवी पर्स खत्म होने के बाद पूर्व राजघरानों के विशेषाधिकार भी समाप्त हो गए।

गायत्री देवी की लोकप्रियता और जयपुर में लगातार चुनावी सफलता ने उन्हें कांग्रेस के लिए एक मजबूत विपक्षी चेहरा बना दिया था।

25 जून 1975 को लगा आपातकाल

25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने देश में आपातकाल लागू किया। इसके बाद विपक्षी नेताओं और सरकार के विरोधियों की गिरफ्तारियों का दौर शुरू हुआ।

इसी दौरान जयपुर राजघराना भी सरकारी कार्रवाई के दायरे में आया। गायत्री देवी उस समय संसद सदस्य थीं। जुलाई 1975 के अंत में वह दिल्ली पहुंचीं और 30 जुलाई को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

विदेशी मुद्रा कानून के तहत हुई गिरफ्तारी

गायत्री देवी को COFEPOSA यानी Conservation of Foreign Exchange and Prevention of Smuggling Activities Act के तहत गिरफ्तार किया गया था। सरकारी कार्रवाई के पीछे विदेशी मुद्रा और कथित तौर पर कर संबंधी मामलों से जुड़े आरोप बताए गए।

ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, उनके खिलाफ कार्रवाई में पूर्व जयपुर राजपरिवार की संपत्तियों से मिली विदेशी मुद्रा और अन्य सामान का मामला भी शामिल था। हालांकि, उनकी गिरफ्तारी का राजनीतिक संदर्भ इसलिए बेहद महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि यह कार्रवाई आपातकाल के दौरान हुई थी और वह इंदिरा गांधी की सरकार की प्रमुख राजनीतिक विरोधियों में थीं।

शाही महल से सीधे तिहाड़ जेल

जयपुर की महारानी का जीवन अचानक पूरी तरह बदल गया। जिस महिला ने राजमहल में जीवन बिताया था, उसे दिल्ली की तिहाड़ जेल में आम कैदियों के बीच रहना पड़ा।

गायत्री देवी करीब साढ़े पांच महीने तिहाड़ जेल में रहीं। जेल में उन्हें राजनीतिक बंदियों के साथ-साथ सामान्य महिला कैदियों के बीच भी समय बिताना पड़ा। बाद में उन्होंने अपने संस्मरणों में जेल के अनुभवों का जिक्र किया।

आपातकाल के दौरान ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया को भी गिरफ्तार करके तिहाड़ लाया गया था। दोनों राजघरानों की इन महिलाओं की गिरफ्तारी ने उस समय देशभर में काफी चर्चा पैदा की।

जेल में बिगड़ी तबीयत, फिर मिली पैरोल

तिहाड़ में रहने के दौरान गायत्री देवी की तबीयत भी खराब हुई। दिसंबर 1975 के आखिर में उन्हें पेट में लगातार दर्द की शिकायत के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया। उन्हें पित्त की पथरी की समस्या बताई गई और ऑपरेशन की जरूरत पड़ी।

इसके बाद उनकी रिहाई के लिए पैरोल की प्रक्रिया आगे बढ़ी। शाह आयोग के दस्तावेजों के अनुसार, गायत्री देवी की पैरोल पर रिहाई जनवरी 1976 में हुई।

क्या इंदिरा गांधी ने बदला लेने के लिए गायत्री देवी को जेल भेजा था?

यही इस पूरी कहानी का सबसे विवादित सवाल है।

गायत्री देवी की गिरफ्तारी के पीछे सरकार ने कानूनी और आर्थिक आरोपों को आधार बनाया था। इसलिए यह कहना कि सिर्फ इंदिरा गांधी से राजनीतिक दुश्मनी के कारण उन्हें जेल भेजा गया, एक निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य नहीं है।

लेकिन दूसरी तरफ, गायत्री देवी की राजनीतिक पृष्ठभूमि और इंदिरा गांधी के साथ उनके तनाव के कारण गिरफ्तारी को लेकर राजनीतिक सवाल लगातार उठते रहे। खुद गायत्री देवी ने 1977 में India Today को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें अपनी गिरफ्तारी के आरोपों की स्पष्ट जानकारी नहीं थी और उन्होंने इसकी वजह विपक्ष में होना या जयपुर में कांग्रेस की लगातार चुनावी हार को माना हो सकता है।

यानी इतिहास में उनकी गिरफ्तारी को कानूनी कार्रवाई और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता—दोनों संदर्भों में देखा जाता है।

जेल से निकलने के बाद राजनीति से बनाई दूरी

तिहाड़ जेल से बाहर आने के बाद गायत्री देवी ने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली। उन्होंने बाद में अपनी आत्मकथा ‘A Princess Remembers: The Memoirs of the Maharani of Jaipur’ में अपने जीवन और जेल के अनुभवों को भी दर्ज किया।

गायत्री देवी की कहानी इसलिए खास है क्योंकि उनकी जिंदगी भारतीय लोकतंत्र के एक बेहद उथल-पुथल भरे दौर की गवाह रही। एक तरफ वह जयपुर की महारानी थीं, दूसरी तरफ जनता के वोट से लगातार लोकसभा चुनाव जीतने वाली लोकप्रिय नेता। और फिर वही महारानी आपातकाल के दौरान तिहाड़ जेल की कैदी बनीं।

जयपुर की महारानी से तिहाड़ की कैदी तक

गायत्री देवी की कहानी सिर्फ राजसी वैभव और राजनीति की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब देश में आपातकाल लगा हुआ था, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हो रही थीं और सत्ता के खिलाफ आवाज उठाना बेहद कठिन हो गया था।

आज भी जब 1975 के आपातकाल की चर्चा होती है, तो महारानी गायत्री देवी की गिरफ्तारी और तिहाड़ जेल में बिताए गए साढ़े पांच महीने उस दौर की सबसे चर्चित घटनाओं में शामिल होते हैं।

You may also like