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जीवन के हर मोड़ पर गीता का संग

बचपन से वृद्धावस्था तक — भगवद् गीता के जीवन बदलने वाले संदेशों पर एक भावपूर्ण कविता

by desk

“जीवन के हर मोड़ पर गीता का संग”

(सुंदर और भावपूर्ण कविता जिसमें जीवन के हर चरण — बचपन, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था — में भगवद् गीता के महत्व को दर्शाया गया है)

गीता न कोई ग्रंथ मात्र है,
वह तो जीवन का सर्वोच्च सूत्र है,
हर उम्र, हर राह, हर अवस्था में,
तमस हरे बन ज्योतिपुंज आस्था में।
बचपन में — (मासूम मन का ज्ञान)
जब बचपन होता कोरा श्यामपट,
मन में उठते प्रश्नों के घुमड़ते घट ।
गीता सिखाए सत्य का प्रथम सद् विचार
सदैव करुणा हो, ना हो अहंकार ।
किशोरावस्था में — (संघर्षों की पहचान)
जब मन उलझे भावनाओं के जाल में,
रहे न समझ क्या सही, क्या चाल में।
गीता कहे — “धैर्य रखो, स्वविवेक को मानो,
उत्तम निर्णय लो, अपनों को जानो”।
युवावस्था में — (कर्म और आत्मबल)
जब उड़ान हो सपनों के शिखर पर,
कभी हो विफलता, कभी हो श्रेष्ठ नर ।
गीता कहे — “कर्म करते जाओ,
प्रतिफल की चिंता छोड़ते जाओ”।
प्रौढ़ावस्था में — (उत्तरदायित्व का भार)
जब कंधों पर हो परिवार का भार,
हर दिन हो संघर्ष और द्वंद विचार।
गीता कहे — “कर्तव्य ही है पूजा
हर रिश्ते में सेवाभाव दे दुगुना मजा”।
वृद्धावस्था में — (शांति और वैराग्य)
जब तन थके, पर मन चाहे सुकून,
जग से मोह घटे, बढ़े परमात्मा की धुन।
गीता कहे — “अब भीतर निहारो,
ईश्वर से रिश्ता  फिर से निखारो”।
– डॉक्टर मनीष श्रीवास्तव, नेत्र विशेषज्ञ, रायपुर, छत्तीसगढ़

 

अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं। इससे सहमत या असहमत होना पाठकों का व्यक्तिगत अधिकार है। यह लेख जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से है, यह किसी भी प्रकार की पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।

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