रायपुर। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु शुक्रवार को जगदलपुर में आयोजित विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा उत्सव में शामिल हुईं। उन्होंने बस्तर की अनूठी धार्मिक परंपराओं, जनजातीय संस्कृति और सामूहिक आस्था की सराहना करते हुए इसे सामाजिक समरसता और लोकतांत्रिक मूल्यों का जीवंत प्रतीक बताया।

राष्ट्रपति ने कहा कि लगभग 75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा देश के अन्य उत्सवों से अलग पहचान रखता है। इसमें विभिन्न समुदायों के लोग रथ निर्माण, पूजा-अर्चना और पारंपरिक अनुष्ठानों में अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत और आपसी सहयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है।
मुरिया दरबार को बताया लोकतंत्र की जमीनी मिसाल
राष्ट्रपति मुर्मु ने मुरिया दरबार की परंपरा को लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि इसमें समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि एक साथ बैठकर जनसमस्याओं और आवश्यकताओं पर चर्चा करते हैं। संवाद और सामूहिक निर्णय की यह परंपरा भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करती है।

उन्होंने जनजातीय युवाओं की प्रतिभा को प्रोत्साहित करने पर जोर देते हुए बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजनों की सराहना की। राष्ट्रपति ने कहा कि उचित अवसर और संसाधन मिलने पर जनजातीय समाज के युवा खेल, कला और अन्य क्षेत्रों में देश का नाम रोशन कर सकते हैं।
माओवाद मुक्त बस्तर में विकास को मिलेगी नई गति: मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति का स्वागत करते हुए कहा कि बस्तर हिंसक माओवाद से मुक्त होकर नवनिर्माण और विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा यहां की समृद्ध लोक संस्कृति, सामूहिक सहभागिता और सामाजिक विश्वास का प्रतीक है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य सरकार दूरस्थ क्षेत्रों तक विकास योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए काम कर रही है। नियद नेल्लानार, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और पीएम-जनमन योजना के माध्यम से अंदरूनी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है।
उन्होंने रायपुर से रावघाट तक रेल सेवा, रावघाट-जगदलपुर रेल लाइन पर जारी काम, सड़क संपर्क, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा सुविधाओं के विस्तार का भी उल्लेख किया। मुख्यमंत्री के अनुसार, बस्तर में पर्यटन, वन उपज और स्थानीय उद्यमों को बढ़ावा देकर रोजगार के नए अवसर तैयार किए जा रहे हैं।
मांझियों और चालकी के मानदेय में बढ़ोतरी
बस्तर की सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षित रखने वाले पारंपरिक प्रतिनिधियों के लिए राज्य सरकार ने मासिक मानदेय बढ़ाने की घोषणा की है।
– मांझी: ₹2,000 से बढ़ाकर ₹5,000 प्रतिमाह।
– चालकी: ₹1,500 से बढ़ाकर ₹3,500 प्रतिमाह।
संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि यह निर्णय बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखने वाले पारंपरिक प्रतिनिधियों के योगदान के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
प्रकृति संरक्षण और जनजातीय विरासत पर दिया जोर
राष्ट्रपति ने कहा कि जंगल, पहाड़ और प्राकृतिक संसाधन जनजातीय जीवन दर्शन का अभिन्न हिस्सा हैं। प्रकृति से मिलने वाले संसाधनों का उपयोग जिम्मेदारी के साथ करना और उनका संरक्षण करना आवश्यक है। उन्होंने अधिक से अधिक पौधे लगाने और वनों को सुरक्षित रखने का आह्वान किया।
उन्होंने दंडकारण्य से जुड़े ऐतिहासिक एवं धार्मिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा कि बस्तर की सांस्कृतिक विरासत भारतीय परंपरा का महत्वपूर्ण अंग है। साथ ही उन्होंने वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य में जनजातीय समाज की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया।
27 अक्टूबर को होगी देवी-देवताओं की पारंपरिक विदाई
बस्तर दशहरा की विशिष्ट परंपराओं का उल्लेख करते हुए राष्ट्रपति ने कुटुम्ब जात्रा और 27 अक्टूबर को मां दंतेश्वरी तथा देवी मावली की डोली विदाई जैसे आयोजनों को उत्सव की सांस्कृतिक विशेषता बताया। उन्होंने बस्तरवासियों के उज्ज्वल भविष्य और छत्तीसगढ़ की निरंतर प्रगति की कामना की।
कार्यक्रम में राज्यपाल रमेन डेका, उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा, वन मंत्री केदार कश्यप, कृषि मंत्री राम विचार नेताम, शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े सहित अनेक जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी और पारंपरिक मांझी-चालकी उपस्थित रहे।
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