नई दिल्ली: वैवाहिक बलात्कार यानी Marital Rape के मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी लड़ाई आगे बढ़ रही है। सुप्रीम कोर्ट ने उन याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई का रास्ता साफ कर दिया है, जिनमें विवाह के भीतर बिना सहमति बनाए गए यौन संबंध को बलात्कार की श्रेणी से बाहर रखने वाले कानूनी अपवाद को चुनौती दी गई है।
क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह है कि क्या पति द्वारा पत्नी की इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाने को बलात्कार के अपराध के रूप में माना जा सकता है, जबकि मौजूदा कानून में वैवाहिक संबंधों के लिए एक विशेष अपवाद मौजूद है।
मामला पुराने IPC की धारा 375 के Exception 2 और वर्तमान Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS) की धारा 63 से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं की मांग है कि इस अपवाद को असंवैधानिक घोषित किया जाए या इस तरह पढ़ा जाए कि पत्नी की स्पष्ट असहमति के बावजूद बनाया गया यौन संबंध अपराध की श्रेणी में आ सके।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
9 सितंबर की सुनवाई में CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले की गंभीर संवैधानिक प्रकृति पर विचार किया। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं।
कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण सवाल भी उठाया कि यदि मौजूदा कानून वैवाहिक बलात्कार को बलात्कार की परिभाषा से बाहर रखता है, तो उस कानून की संवैधानिक वैधता पर फैसला आने से पहले पति पर बलात्कार का मुकदमा किस आधार पर चलाया जा सकता है।
महिला की सहमति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल
सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने यह व्यापक संवैधानिक प्रश्न भी आया कि क्या विवाह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता और शारीरिक स्वतंत्रता को समाप्त कर देता है?
कोर्ट की टिप्पणी का मूल विचार यह रहा कि विवाह अपने आप में किसी महिला की व्यक्तिगत स्वायत्तता को समाप्त नहीं कर सकता। हालांकि, अदालत को यह भी तय करना है कि मौजूदा कानून की सीमा के भीतर न्यायपालिका किस हद तक हस्तक्षेप कर सकती है।
केंद्र सरकार और याचिकाकर्ताओं की अलग-अलग दलील
केंद्र सरकार ने पहले इस तरह के प्रावधान को हटाने के खिलाफ सावधानी बरती है और तर्क दिया है कि इससे विवाह संस्था और उससे जुड़े कानूनी-सामाजिक ढांचे पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। वहीं याचिकाकर्ताओं का कहना है कि विवाह के बाद भी महिला की शारीरिक स्वायत्तता और यौन सहमति समाप्त नहीं होती।
अब आगे क्या होगा
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अंतिम सुनवाई तीन सप्ताह बाद शुरू करने का निर्देश दिया है और सुनवाई के लिए बुधवार और गुरुवार निर्धारित किए हैं। अदालत को मुख्य रूप से यह तय करना है कि वैवाहिक बलात्कार संबंधी मौजूदा अपवाद संवैधानिक है या नहीं और उसके रहते किसी पति पर बलात्कार के आरोप में अभियोजन की कानूनी स्थिति क्या होगी।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
इस फैसले का असर केवल एक कानूनी प्रावधान पर नहीं पड़ेगा। इससे विवाह में सहमति, महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, आपराधिक कानून और विवाह संस्था की कानूनी स्थिति जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों की दिशा प्रभावित हो सकती है।
फिलहाल यह ध्यान रखना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने का अंतिम फैसला नहीं दिया है। मामला अंतिम सुनवाई की ओर बढ़ रहा है।
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