नई दिल्ली। भारतीय साहित्य की दुनिया में अमृता प्रीतम का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। कवयित्री, उपन्यासकार और निबंधकार अमृता प्रीतम ने अपनी लेखनी के जरिए प्रेम, महिलाओं की स्वतंत्रता, सामाजिक बदलाव और भारत-पाकिस्तान विभाजन की त्रासदी को आवाज दी। उनका जन्म 31 अगस्त 1919 को तत्कालीन अविभाजित भारत के गुजरांवाला में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है।
बचपन से ही साहित्य की ओर झुकाव
अमृता प्रीतम का मूल नाम अमृत कौर था। उनके पिता करतार सिंह हितकारी कवि और विद्वान थे। साहित्यिक वातावरण के कारण अमृता की रुचि बचपन से ही कविता और लेखन में विकसित हुई। उन्होंने कम उम्र में ही कविताएं लिखना शुरू कर दिया था।
उनका पहला कविता संग्रह ‘ठंडियां किरणां’ 1935 में प्रकाशित हुआ था। उस समय उनकी उम्र लगभग 16 वर्ष थी। बाद में उन्होंने पंजाबी के साथ-साथ हिंदी में भी लेखन किया।
बंटवारे के दर्द को कविता में उतारा
1947 का भारत-पाकिस्तान विभाजन अमृता प्रीतम के जीवन और लेखन पर गहरा प्रभाव डालने वाली घटना थी। विभाजन के दौरान हुए हिंसा और विस्थापन ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया।
उनकी सबसे प्रसिद्ध कविताओं में ‘अज्ज आखां वारिस शाह नूं’ शामिल है। यह कविता 18वीं सदी के पंजाबी कवि वारिस शाह को संबोधित करते हुए विभाजन की त्रासदी और पंजाब के लोगों के दर्द को व्यक्त करती है।
विभाजन के बाद अमृता प्रीतम लाहौर से भारत आ गईं और दिल्ली में रहने लगीं। इसके बाद उनके लेखन में हिंदी का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा।
‘पिंजर’ ने महिलाओं के दर्द को दी आवाज
अमृता प्रीतम का सबसे चर्चित उपन्यास ‘पिंजर’ 1950 में प्रकाशित हुआ। इसमें विभाजन के दौर में महिलाओं के सामने आई हिंसा, विस्थापन और सामाजिक परिस्थितियों को कहानी के माध्यम से सामने रखा गया।
उपन्यास की मुख्य पात्र पूरो के जरिए अमृता प्रीतम ने उस दौर की महिलाओं की पीड़ा और सामाजिक संघर्ष को बेहद प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया। बाद में ‘पिंजर’ पर इसी नाम से फिल्म भी बनी, जो 2003 में रिलीज हुई।
100 से ज्यादा किताबों का साहित्यिक संसार
अमता प्रीतम ने करीब छह दशकों के साहित्यिक जीवन में 100 से अधिक पुस्तकों की रचना की। इनमें कविता संग्रह, उपन्यास, कहानियां, निबंध, आत्मकथात्मक लेखन और अन्य साहित्यिक रचनाएं शामिल हैं। उनकी रचनाओं का कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हुआ।
उनकी चर्चित रचनाओं में शामिल हैं—
– पिंजर
– अज्ज आखां वारिस शाह नूं
– सुनेहड़े/सुनहारे
– कागज ते कैनवास
– रसीदी टिकट
– नागमणि
उनकी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ भी बेहद चर्चित रही।
पुरस्कारों से भी हुआ सम्मान
अमृता प्रीतम को साहित्य में उनके योगदान के लिए कई बड़े सम्मान मिले।
साहित्य अकादमी पुरस्कार — 1956:
वह साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाली पहली महिला बनीं। उन्हें यह सम्मान उनकी कृति ‘सुनेहड़े’ के लिए मिला।
पद्मश्री — 1969:
भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।
भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार — 1982:
उन्हें ‘कागज ते कैनवास’ के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
पद्म विभूषण — 2004:
साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसी वर्ष उन्हें साहित्य अकादमी फेलोशिप भी मिली।
राज्यसभा की सदस्य भी रहीं
अमृता प्रीतम को 1986 में राज्यसभा के लिए नामित किया गया और उन्होंने 1986 से 1992 तक संसद के उच्च सदन की सदस्य के रूप में कार्य किया।
31 अक्टूबर 2005 को हुआ निधन
लंबे और प्रभावशाली साहित्यिक जीवन के बाद अमृता प्रीतम का 31 अक्टूबर 2005 को दिल्ली में 86 वर्ष की उम्र में निधन हुआ। लेकिन उनकी कविताएं, कहानियां और उपन्यास आज भी पाठकों के बीच जीवित हैं।
क्यों याद की जाती हैं अमृता प्रीतम?
अमृता प्रीतम सिर्फ एक कवयित्री या लेखिका नहीं थीं। उन्होंने अपने समय की महिलाओं, प्रेम, सामाजिक रूढ़ियों और विभाजन के दर्द को अपनी लेखनी का विषय बनाया। पंजाबी और हिंदी साहित्य में उनका योगदान उन्हें भारतीय साहित्य की सबसे प्रभावशाली महिला लेखिकाओं में शामिल करता है।