अटल बिहारी वाजपेयी पुण्यतिथि: राजनीति के ‘अटल’ अध्याय को आज भी याद करता है देश, कविता से संसद तक छोड़ी अमिट छाप

नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में कुछ नेता ऐसे रहे हैं, जिनका प्रभाव उनके पद से कहीं आगे तक दिखाई देता है। अटल बिहारी वाजपेयी उन्हीं नेताओं में शामिल हैं। पूर्व प्रधानमंत्री, प्रखर वक्ता, कुशल राजनेता और संवेदनशील कवि के रूप में वाजपेयी ने भारतीय सार्वजनिक जीवन पर गहरी छाप छोड़ी। 16 अगस्त 2018 को उनके निधन के बाद देश ने एक ऐसे नेता को खो दिया, जिसकी पहचान राजनीतिक सीमाओं से कहीं बड़ी थी। आज उनकी पुण्यतिथि पर देश उन्हें श्रद्धा के साथ याद कर रहा है।

वाजपेयी का व्यक्तित्व कई रंगों से बना था। संसद में उनके भाषणों की गूंज अलग पहचान रखती थी तो साहित्य की दुनिया में उनकी कविताएं संवेदनशील मन की अभिव्यक्ति थीं। राजनीतिक विरोधियों के साथ भी संवाद बनाए रखने की उनकी क्षमता उन्हें समकालीन नेताओं से अलग करती थी।

तीन बार बने भारत के प्रधानमंत्री

अटल बिहारी वाजपेयी भारत के प्रधानमंत्री के पद पर तीन बार पहुंचे। 1996 में पहली बार उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन उनकी सरकार केवल 13 दिन चल सकी। इसके बाद 1998 में उन्होंने दोबारा प्रधानमंत्री पद संभाला। 1999 के आम चुनाव के बाद वे तीसरी बार प्रधानमंत्री बने और 2004 तक इस पद पर रहे।

उनके नेतृत्व वाली सरकार के दौरान भारत ने कई महत्वपूर्ण राजनीतिक, सामरिक और आर्थिक फैसले लिए। उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल को देश के आधुनिक राजनीतिक इतिहास के अहम दौर के रूप में देखा जाता है।

पोखरण परमाणु परीक्षण से दुनिया को दिया संदेश

वाजपेयी सरकार के कार्यकाल की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में 1998 का पोखरण परमाणु परीक्षण शामिल है। भारत ने परमाणु परीक्षण कर अपनी सामरिक क्षमता का प्रदर्शन किया। इस फैसले के बाद भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव और प्रतिबंध भी लगाए गए, लेकिन तत्कालीन सरकार ने अपने निर्णय का बचाव किया।

इस कदम ने भारत की सुरक्षा नीति और वैश्विक कूटनीति में एक नया अध्याय जोड़ा। वाजपेयी के नेतृत्व में भारत ने अपनी सुरक्षा जरूरतों को लेकर स्पष्ट और दृढ़ रुख अपनाया।

कारगिल युद्ध में दिखा मजबूत नेतृत्व

1999 का कारगिल युद्ध भी अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री कार्यकाल की बड़ी घटना थी। पाकिस्तान समर्थित घुसपैठियों और सैनिकों ने कारगिल क्षेत्र में भारतीय क्षेत्रों पर कब्जा करने की कोशिश की थी। भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय के तहत दुश्मन को पीछे हटाया।

युद्ध के दौरान वाजपेयी सरकार ने सैन्य और कूटनीतिक दोनों मोर्चों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत ने पाकिस्तान की घुसपैठ का मुद्दा मजबूती से रखा।

पाकिस्तान के साथ शांति की कोशिश

अटल बिहारी वाजपेयी को केवल मजबूत निर्णयों के लिए ही नहीं, बल्कि शांति की पहल के लिए भी याद किया जाता है। 1999 में दिल्ली-लाहौर बस सेवा शुरू करना इसी प्रयास का हिस्सा था। वाजपेयी स्वयं बस से लाहौर पहुंचे और दोनों देशों के बीच बेहतर संबंधों की उम्मीद जताई।

हालांकि इसके कुछ ही समय बाद कारगिल युद्ध ने भारत-पाकिस्तान संबंधों को फिर तनाव में ला दिया। इसके बावजूद वाजपेयी का मानना था कि पड़ोसी देशों के बीच समस्याओं का समाधान संवाद के जरिए तलाशने की कोशिश जारी रहनी चाहिए।

सड़क और बुनियादी ढांचे पर बड़ा जोर

वाजपेयी सरकार ने देश के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर भी जोर दिया। स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना के माध्यम से देश के प्रमुख महानगरों को बेहतर सड़क नेटवर्क से जोड़ने का काम आगे बढ़ाया गया।

इसी दौर में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के जरिए ग्रामीण इलाकों को सड़कों से जोड़ने की दिशा में भी बड़ा कदम उठाया गया। इन योजनाओं को देश के सड़क और परिवहन ढांचे के विकास में महत्वपूर्ण माना जाता है।

संसद में विरोधी भी करते थे सम्मान

वाजपेयी की सबसे बड़ी ताकत उनकी वक्तृत्व कला मानी जाती थी। वे बेहद प्रभावशाली तरीके से अपनी बात रखते थे। उनके भाषणों में राजनीतिक तर्क के साथ साहित्य और व्यंग्य की झलक भी दिखाई देती थी।

उनकी खासियत यह थी कि वे अपने राजनीतिक विरोधियों के साथ भी व्यक्तिगत स्तर पर संवाद बनाए रखते थे। यही वजह थी कि अलग-अलग विचारधाराओं के नेता भी उनके व्यक्तित्व का सम्मान करते थे।

राजनीति के साथ कविता से भी था गहरा रिश्ता

अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा उनका कवि रूप था। उनकी कविताओं में देश, संघर्ष, उम्मीद, निराशा और जीवन के प्रति गहरा दृष्टिकोण देखने को मिलता है।

उनकी कविता ‘हार नहीं मानूंगा’ आज भी लोगों में संघर्ष और आगे बढ़ने का जज्बा पैदा करती है। राजनीति की कठिन परिस्थितियों के बीच भी उनका साहित्यिक पक्ष उनके व्यक्तित्व को संवेदनशील बनाता था।

भारत रत्न से हुए सम्मानित

देश के लिए उनके लंबे सार्वजनिक जीवन और योगदान को देखते हुए उन्हें 2015 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। इससे पहले उन्हें पद्म विभूषण सहित कई सम्मान मिल चुके थे।

उनके जन्मदिन 25 दिसंबर को देश में सुशासन दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसके जरिए उनके प्रशासनिक दृष्टिकोण और सुशासन की सोच को याद किया जाता है।

93 साल की उम्र में हुआ निधन

लंबे समय तक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी का निधन 16 अगस्त 2018 को नई दिल्ली के एम्स में हुआ। वे 93 वर्ष के थे।

उनके निधन की खबर से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। राजनीतिक दलों की सीमाओं से ऊपर उठकर नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया।

आज उनकी पुण्यतिथि पर अटल बिहारी वाजपेयी को केवल एक पूर्व प्रधानमंत्री के तौर पर नहीं, बल्कि ऐसे जननेता के रूप में याद किया जाता है, जिसने राजनीति को शब्दों की गरिमा, विचारों की मजबूती और संवाद की ताकत दी।

अटल जी की कविता की चार यादगार पंक्तियां

हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा,
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं।
गीत नया गाता हूं।
गीत नया गाता हूं।

अटल बिहारी वाजपेयी के 10 प्रसिद्ध और प्रेरणादायक कथन:

  1. “हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा, काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं, गीत नया गाता हूं।”
  2. “छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।”
  3. “सूरज एक दिन फिर निकलेगा, अंधेरा छंटेगा।”
  4. “हम युद्ध नहीं चाहते, लेकिन युद्ध थोपा गया तो हम पीछे नहीं हटेंगे।”
  5. “मित्र बदले जा सकते हैं, पड़ोसी नहीं।”
  6. “भारत कोई जमीन का टुकड़ा नहीं है, यह जीता-जागता राष्ट्रपुरुष है।”
  7. “लोकतंत्र में संख्या का महत्व है, लेकिन संख्या ही सब कुछ नहीं है।”
  8. “हम सत्ता के लिए राजनीति नहीं करते, हम राजनीति को राष्ट्रसेवा का माध्यम मानते हैं।”
  9. “राष्ट्र की सच्ची शक्ति उसकी सेना में नहीं, उसके नागरिकों की एकता और संकल्प में होती है।”
  10. “मनुष्य को चाहिए कि वह परिस्थितियों से लड़े, एक सपना टूटे तो दूसरा सपना देखे।”

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