विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक — FCRA अमेंडमेंट बिल, 2026 — की जांच के लिए बनाई गई संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की आज पहली बैठक हो रही है। यह विधेयक 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था, लेकिन केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में तब होने वाले विधानसभा चुनावों और वहां चर्च संगठनों की आपत्तियों के चलते इस पर बहस को टाल दिया गया था। बाद में 12 अगस्त 2026 को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने इसे व्यापक विचार-विमर्श के लिए जेपीसी को भेजने का प्रस्ताव रखा, जिसे सदन ने ध्वनिमत से पारित कर दिया।
इस 31 सदस्यीय समिति में लोकसभा से 21 और राज्यसभा से 10 सदस्य शामिल किए गए हैं, जिन्हें क्रमशः लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति ने नामित किया है। समिति को अपनी रिपोर्ट शीतकालीन सत्र के पहले सप्ताह के आखिरी दिन तक सदन में पेश करनी है।
विधेयक का मुख्य उद्देश्य विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 में संशोधन कर विदेशी चंदे के इस्तेमाल को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। इसमें एक नया अध्याय IIIA जोड़ने का प्रस्ताव है, जिसके तहत जिन संस्थाओं का FCRA सर्टिफिकेट रद्द, सरेंडर या समाप्त हो चुका है, उनका विदेशी चंदा एक “नामित प्राधिकरण” के पास अस्थायी रूप से चला जाएगा। अगर तय समय में नया सर्टिफिकेट हासिल नहीं किया गया, तो यह संपत्ति स्थायी रूप से सरकार के पास चली जाएगी।
विपक्ष और कुछ अल्पसंख्यक संगठनों ने इस पर चिंता जताई थी, जिसके जवाब में केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सदन में स्पष्ट किया कि विधेयक में किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय या NGO को निशाना बनाने का कोई प्रावधान नहीं है, और भारत विदेशी फंड को लेकर कोई “बनाना रिपब्लिक” नहीं है।