स्वास्थ्य सेवा में आज़ादी: 80वें स्वतंत्रता दिवस पर एक चिंतन

भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर केवल अतीत की उपलब्धियों को याद करने का समय नहीं हैं, बल्कि यह पूछने का भी सही अवसर है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में ‘आजादी’ का वास्तविक अर्थ क्या है?

​स्वास्थ्य सेवा में स्वतंत्रता का तात्पर्य केवल बीमारियों से मुक्ति नहीं है. इसका सही अर्थ यह है कि मरीज को बिना भौगोलिक बाधाओं के गुणवत्तापूर्ण इलाज मिले; बुजुर्ग गरिमा और जीवंतता के साथ जीवन व्यतीत कर सकें; युवा डॉक्टरों को गुणवत्तापूर्ण विशेषज्ञ प्रशिक्षण मिले; और महिला डॉक्टरों सहित सभी स्वास्थ्यकर्मियों को सुरक्षित, सम्मानजनक और आधुनिक वातावरण में काम करने का अधिकार मिले.

​आज चिकित्सा विज्ञान एक अभूतपूर्व बदलाव के दौर से गुजर रहा है. इलाज का ध्यान अब केवल ‘बीमारी होने के बाद उसके उपचार’ पर केंद्रित नहीं है, बल्कि ‘निवारक देखभाल’ (प्रिवेंटिव वेलनेस), स्वस्थ एजिंग और कोशिकीय स्तर पर शरीर के कायाकल्प (सेलुलर रीजेनरेशन) की ओर बढ़ रहा है. लेकिन प्रणालीगत (सिस्टम) स्तर पर भारत के सामने चुनौतियां बिल्कुल अलग हैं. हमने देश में मेडिकल कॉलेजों, अस्पतालों और स्नातकोत्तर (पीजी) सीटों का बड़ा विस्तार तो कर लिया है, लेकिन अब ध्यान केवल ‘संख्या’ बढ़ाने पर नहीं, बल्कि गुणवत्ता, सुरक्षा और समान वितरण पर होना चाहिए.

​एक दौर था जब एस्थेटिक मेडिसिन को केवल ढलती उम्र के निशानों को छिपाने का जरिया माना जाता था. आज यह विज्ञान त्वचा के भीतर मौजूद कोलाजन, टिशू रिपेयर और सेलुलर सिग्नलिंग की गहरी प्रक्रियाओं को समझने की दिशा में काम कर रहा है. माइक्रोनीडलिंग, रेडियोफ्रीक्वेंसी और बायोसटिम्युलेटरी इंजेक्टेबल्स जैसी प्रौद्योगिकियां अब व्यक्तिगत उपचार प्रोटोकॉल का हिस्सा बन रही हैं.

​इसी तरह, रीजेनरेटिव एस्थेटिक्स में ‘एक्सोसोम्स’ (Exosomes) की भूमिका को लेकर काफी चर्चा है. एक्सोसोम्स कोशिकाओं के बीच संचार का काम करते हैं और त्वचा के पुनरुद्धार व घाव भरने में मददगार साबित हो रहे हैं. 2026 के एक व्यवस्थित अध्ययन और मेटा-विश्लेषण में एस्थेटिक और हेयर केयर में इसके सकारात्मक परिणाम देखे गए हैं.

​हालांकि, जिम्मेदार चिकित्सा विज्ञान का तकाजा है कि हम नवाचार (इनोवेशन) और अतिशयोक्ति (हाइप) के बीच स्पष्ट अंतर समझें. एक्सोसोम्स या नए एंटीऑक्सीडेंट्स को ‘चमत्कारी इलाज’ के रूप में जब तक व्यापक और दीर्घकालिक नैदानिक प्रमाण (क्लिनिकल एविडेंस) उपलब्ध न हों, तब तक साक्ष्य-आधारित चिकित्सा ही हमारा प्राथमिक मानदंड होना चाहिए.

आज जिस समय प्रयोगशालाओं में कोशिका स्तर पर पुनर्जीवन की खोज हो रही है, उसी समय भारत को अपनी ढांचागत स्वास्थ्य व्यवस्था का कायाकल्प करने की सख्त जरूरत है. केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की 2024–25 की रिपोर्ट के अनुसार, देश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या 2013–14 के 387 से बढ़कर 2024–25 में 780 हो गई है. एमबीबीएस सीटें 1,18,137 और स्नातकोत्तर सीटें 73,157 तक पहुंच चुकी हैं. डब्ल्यूएचओ (WHO) के आंकड़ों के मुताबिक भारत में डॉक्टर-आबादी अनुपात में भी काफी सुधार हुआ है. ​लेकिन राष्ट्रीय औसत अक्सर क्षेत्रीय असमानताओं को छिपा देता है.

सवाल यह नहीं है कि भारत में कुल कितने डॉक्टर हैं? असली सवाल यह हैं:
​क्या ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों में विशेषज्ञ उपलब्ध हैं?
​आपातकालीन स्थिति में मरीज को कितनी दूर यात्रा करनी पड़ती है?
​क्या अस्पतालों में पर्याप्त उपकरण उपलब्ध हैं?
​और क्या वहां काम करने वाला डॉक्टर सुरक्षित माहौल में अपना कर्तव्य निभा पा रहा है?

राष्ट्रीय औसत से आगे: ‘स्थानीय उपलब्धता की गारंटी’
​कागजों पर आंकड़ों का बेहतर दिखना किसी दूरस्थ जिले के मरीज की जान नहीं बचा सकता. इसलिए भारत का अगला लक्ष्य सिर्फ aggregate ratios नहीं, बल्कि हर जिले में ‘विशेषज्ञों की उपलब्धता की गारंटी’ होना चाहिए. ​एनेस्थिसियोलॉजी, जनरल सर्जरी, स्त्री एवं प्रसूति रोग, ईएनटी, रेडियोलॉजी और इमरजेंसी मेडिसिन जैसे मौलिक विषयों के विशेषज्ञ हर जिला स्तर पर उपलब्ध होने चाहिए. पीएमएसएसवाई (PMSSY) जैसी योजनाओं ने नए एम्स (AIIMS) और मेडिकल कॉलेजों के जरिए इस असंतुलन को दूर करने की दिशा में काम किया है, लेकिन इस प्रक्रिया को और गति देने की आवश्यकता है.

आज की दरकार ​सुरक्षा का अधिकार: स्वास्थ्य सेवा का सबसे जरूरी स्तंभ स्वास्थ्य सेवा में स्वतंत्रता का एक अति-महत्वपूर्ण पहलू है—स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा और गरिमा. जब तक अस्पतालों में काम करने वाले डॉक्टर, नर्स और मेडिकल स्टाफ सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे, तब तक एक आधुनिक स्वास्थ्य प्रणाली का निर्माण असंभव है. विशेष रूप से महिला डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए जो देर रात तक या 24 घंटे की शिफ्ट में काम करती हैं, सुरक्षा कोई विशेषाधिकार नहीं बल्कि उनकी बुनियादी आवश्यकता है.

​प्रत्येक चिकित्सा संस्थान में:
​सुरक्षित और स्वच्छ ऑन-ड्यूटी रूम तथा विश्राम गृह
​सीसीटीवी निगरानी और पर्याप्त रोशनी
​प्रभावी आपातकालीन अलर्ट सिस्टम व प्रशिक्षित सुरक्षा कर्मी
​कार्यस्थल पर हिंसा और उत्पीड़न के खिलाफ पारदर्शी एवं सख्त संस्थागत तंत्र अनिवार्य होना चाहिए

​एक मानवीय क्रांति की ओर भविष्य की तकनीकें चाहे कितनी भी उन्नत क्यों न हों, भारतीय स्वास्थ्य सेवा का सही मूल्यांकन इस बात से होगा कि क्या एक छोटे शहर की महिला को इलाज के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर नहीं जाना पड़ता, क्या एक बच्चे को समय पर आपातकालीन देखभाल मिलती है, और क्या एक महिला डॉक्टर अपनी नाइट शिफ्ट के बाद सुरक्षित घर लौट पाती है. ​अगले दशक का दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट होना चाहिए: बीमारी के इलाज से ‘रोकथाम’ की ओर, सिर्फ डॉक्टर गिनने से ‘उनकी उपलब्धता’ सुनिश्चित करने की ओर, और केवल अस्पताल बनाने से ‘संस्थानों को सुरक्षित और मजबूत’ बनाने की ओर. ​एक शल्य चिकित्सक के रूप में, मैं दो तरह के कायाकल्प को साथ-साथ घटित होते देखती हूं—एक जो कोशिकाओं और त्वचा को जीवंतता देता है, और दूसरा जो हमारी स्वास्थ्य प्रणालियों को पुनर्जीवित करता है.

आशा है आज भारत जिस तीव्र गति से अंतरिक्ष अनुसंधान (Space Technology) में नित नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है और वैश्विक पटल पर एक सशक्त आर्थिक व तकनीकी महाशक्ति के रूप में उभर रहा है, ठी उसी वैश्विक मानदंड और दूरदर्शिता की आवश्यकता हमारी चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य प्रणाली में भी है. स्वास्थ्य सेवा कोई साधारण सुविधा नहीं, बल्कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति का सबसे मौलिक आधार है. जैसे हमने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की है, वैसे ही यह समय की मांग है कि सरकार और नीति-निर्धारक चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता, अनुसंधान और अवसंरचना (Infrastructure) को विकसित देशों के समकक्ष लाएं.

​जब देश की स्वास्थ्य सेवाएं, आधुनिक चिकित्सा पद्धतियां और डॉक्टरों की सुरक्षा व प्रशिक्षण उसी गति से आगे बढ़ेंगे जिस गति से भारत का अन्य क्षेत्रों में विकास हो रहा है—तभी हम सही मायनों में एक सक्षम, आत्मनिर्भर और स्वस्थ भारत का निर्माण कर सकेंगे.

– डॉक्टर मान्या ठाकुर, ईएनटी विशेषज्ञ और फेशियल एस्थेटिक सर्जन, रायपुर, छत्तीसगढ़

 

अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं। इससे सहमत या असहमत होना पाठकों का व्यक्तिगत अधिकार है। यह लेख जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से है, यह किसी भी प्रकार की पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।

Related posts

शिक्षा: सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य

डर से आज़ादी: वास्तु डराता नहीं, समझाता है

उद्यमिता: बेरोज़गारी को अवसर में बदलने का रास्ता