अल नीनो का बढ़ता खतरा, भीषण गर्मी के साथ कमजोर मानसून की बढ़ सकती है चिंता

नई दिल्ली। दुनिया के मौसम पर एक बार फिर अल नीनो (El Niño) का खतरा मंडरा रहा है। मौसम और जलवायु को लेकर सामने आ रहे अनुमानों में आने वाले समय में प्रशांत महासागर के समुद्री तापमान में बड़ी वृद्धि की संभावना जताई जा रही है। यदि मजबूत अल नीनो विकसित होता है, तो 2027 वैश्विक स्तर पर बेहद गर्म वर्षों में शामिल हो सकता है।

हालांकि, किसी एक वर्ष को निश्चित रूप से अब तक का सबसे गर्म साल घोषित करना अभी जल्दबाजी होगी। अल नीनो की तीव्रता और उसके वैश्विक प्रभाव का आकलन मौसम वैज्ञानिक लगातार नए आंकड़ों के आधार पर करते हैं।

क्या है अल नीनो?

अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो मुख्य रूप से भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्री सतह के तापमान के सामान्य से अधिक गर्म होने से जुड़ी होती है। समुद्र के तापमान में यह बदलाव दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के तापमान, बारिश और हवाओं के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है।

जब अल नीनो मजबूत होता है, तो वैश्विक औसत तापमान पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। यही वजह है कि वैज्ञानिक अल नीनो की गतिविधियों पर लगातार नजर रखते हैं।

3 डिग्री तापमान बढ़ने का दावा कितना गंभीर?

कुछ रिपोर्टों और अनुमानों में प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों में सामान्य से 3 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान बढ़ने की संभावना की चर्चा की जा रही है। यदि ऐसा होता है तो यह मजबूत अल नीनो की स्थिति का संकेत हो सकता है।

लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 3°C बढ़ना और पूरी दुनिया के औसत तापमान का 3°C बढ़ना एक ही बात नहीं है। दोनों को एक जैसा समझना गलत होगा।

क्या 2027 बन सकता है सबसे गर्म साल?

अल नीनो वैश्विक तापमान को बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण प्राकृतिक कारक है। पिछले मजबूत अल नीनो के दौरान भी वैश्विक तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। यदि भविष्य में मजबूत अल नीनो की स्थिति विकसित होती है और इसके साथ मानव-जनित जलवायु परिवर्तन का प्रभाव जुड़ता है, तो 2027 के अत्यधिक गर्म वर्ष बनने की संभावना बढ़ सकती है।

फिर भी इसे अभी निश्चित भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता। वर्ष के अंत में ही वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर यह तय कर पाएंगे कि वह रिकॉर्ड स्तर पर कितना गर्म रहा।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है अल नीनो?

भारत में अल नीनो को लेकर सबसे बड़ी चिंता मानसून से जुड़ी होती है। ऐतिहासिक रूप से कई अल नीनो वर्षों में भारतीय दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर रहा है, हालांकि हर अल नीनो वर्ष में ऐसा होना जरूरी नहीं है।

कमजोर मानसून का असर खेती, जलाशयों, भूजल और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। यदि बारिश सामान्य से कम रहती है तो खरीफ फसलों के साथ-साथ बाद की रबी फसल के लिए भी सिंचाई और मिट्टी में नमी की स्थिति प्रभावित हो सकती है।

किन फसलों पर पड़ सकता है असर?

मानसून में कमी की स्थिति में धान, मक्का, सोयाबीन, दालों और अन्य खरीफ फसलों पर असर पड़ सकता है। इसके बाद मिट्टी में पर्याप्त नमी और जल उपलब्धता नहीं होने पर गेहूं, चना, सरसों जैसी रबी फसलों की बुवाई और पैदावार भी प्रभावित हो सकती है।

हालांकि फसल पर वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि बारिश कितनी कम या अधिक होती है, उसका वितरण कैसा रहता है और अलग-अलग राज्यों में मौसम की स्थिति क्या रहती है।

सिर्फ बारिश ही नहीं, गर्मी भी बढ़ा सकती है चिंता

मजबूत अल नीनो और पहले से बढ़ते वैश्विक तापमान का संयोजन कई क्षेत्रों में हीटवेव और अत्यधिक गर्मी का खतरा बढ़ा सकता है। इसका असर मानव स्वास्थ्य, बिजली की मांग, पानी की उपलब्धता और कृषि पर पड़ सकता है।

क्या भारत में अभी से चिंता करनी चाहिए?

विशेषज्ञों के लिए अल नीनो की निगरानी महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन किसी संभावित मौसम घटना को लेकर अभी से निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। समुद्र के तापमान, मानसूनी हवाओं, हिंद महासागर की परिस्थितियों और अन्य जलवायु संकेतकों को एक साथ देखकर ही भारत के मौसम पर संभावित प्रभाव का बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है।

अगर मजबूत अल नीनो विकसित होता है, तो भारत के लिए मानसून, कृषि और गर्मी की स्थिति पर विशेष निगरानी रखना जरूरी होगा। आने वाले महीनों में मौसम एजेंसियों के अपडेट इस स्थिति को और स्पष्ट करेंगे।

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