विक्रम-1 के बाद अब आगे क्या? भारत के स्पेस मिशनों का रोडमैप
कल स्काईरूट एयरोस्पेस के विक्रम-1 की सफल लॉन्चिंग के बाद आज देश भर में इस बात की चर्चा है कि भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का अगला पड़ाव क्या होगा. जानकारों का कहना है कि यह लॉन्च सिर्फ एक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत के पूरे स्पेस इकोसिस्टम के लिए एक टर्निंग पॉइंट है.
सिर्फ स्काईरूट नहीं, कई कंपनियां मैदान में
देश की प्राइवेट स्पेस इंडस्ट्री में स्काईरूट एयरोस्पेस अकेली कंपनी नहीं है. Pixxel खेती और पर्यावरण निगरानी के लिए ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट बना रही है, Bellatrix Aerospace सैटेलाइट प्रोपल्शन सिस्टम पर काम कर रही है, जबकि Agnikul Cosmos 3D-प्रिंटेड रॉकेट इंजन से चलने वाले छोटे सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल विकसित कर रही है. इनमें से कई कंपनियां रक्षा क्षेत्र को भी सप्लाई करती हैं, जिससे अंतरिक्ष और सुरक्षा के बीच का दायरा लगातार जुड़ता जा रहा है.

इसरो के गगनयान मिशन की तैयारी तेज
इसी बीच इसरो अपने पहले क्रू मिशन गगनयान की भी तैयारी में जुटा है. इसके तहत तीन बिना क्रू वाले परीक्षणों में से पहला 2026 के अंत में होने की उम्मीद है. इस मिशन का लक्ष्य तीन भारतीय अंतरिक्षयात्रियों को 400 किलोमीटर की कक्षा में तीन दिनों के लिए भेजना है. भारतीय वायुसेना के पायलट शुभांशु शुक्ला पहले ही 2025 में स्पेसएक्स ड्रैगन यान से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की यात्रा कर चुके हैं, जो गगनयान की तैयारियों के लिहाज से एक अहम अनुभव माना जा रहा है.

निवेश और नीति से मिल रही रफ्तार
सरकार की नई स्पेस पॉलिसी के तहत निजी कंपनियों के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र की पूरी वैल्यू चेन खोल दी गई है. अब कोई भी भारतीय कंपनी रॉकेट विकसित कर सकती है, सैटेलाइट बना सकती है, लॉन्च सर्विस दे सकती है और विदेशी ग्राहकों के साथ साझेदारी भी कर सकती है. 400 से ज्यादा स्पेस स्टार्टअप्स और हजारों करोड़ रुपये के निवेश के दम पर भारत अब दुनिया की बड़ी स्पेस शक्तियों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की तैयारी कर रहा है.

आने वाले सालों में चंद्रयान-4 और भारत के अपने स्पेस स्टेशन जैसी बड़ी परियोजनाएं भी पाइपलाइन में हैं. विक्रम-1 की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि इसरो अब अकेला खिलाड़ी नहीं रहा — निजी क्षेत्र अब उसका असली सहयोगी बनकर उभर रहा है.