बस्तर दशहरा 2026: जोगी बिठाई की रस्म शुरू, दौलत कुमार नाग 9 दिन तक करेंगे निर्जला तपस्या

जगदलपुर के सिरहासार भवन में निभाई गई करीब 600 साल पुरानी परंपरा, बस्तर दशहरा के निर्विघ्न आयोजन और क्षेत्र की सुख-समृद्धि के लिए जोगी करेंगे कठिन साधना।

जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा की अनूठी परंपराओं में शामिल जोगी बिठाई की रस्म विधि-विधान के साथ संपन्न हुई। जगदलपुर के सिरहासार भवन में आयोजित इस रस्म के साथ नौ दिनों तक चलने वाली कठिन तपस्या की शुरुआत हुई। इस वर्ष आमाबाल निवासी दौलत कुमार नाग जोगी के रूप में साधना कर रहे हैं। मान्यता है कि जोगी की यह तपस्या बस्तर दशहरा को शांतिपूर्ण और निर्विघ्न तरीके से संपन्न कराने के लिए की जाती है।

बस्तर दशहरा अपनी विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए देश-दुनिया में प्रसिद्ध है। जहां देश के अधिकांश हिस्सों में दशहरा पर्व रावण दहन के साथ मनाया जाता है, वहीं बस्तर में यह पर्व अपनी अलग परंपराओं और रस्मों के कारण विशेष पहचान रखता है। जोगी बिठाई भी इसी परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे करीब 600 वर्षों से निभाया जा रहा है।

क्या है जोगी बिठाई की परंपरा?

जोगी बिठाई की परंपरा के पीछे एक पुरानी मान्यता प्रचलित है। कहा जाता है कि वर्षों पहले बस्तर दशहरा के दौरान हल्बा समाज का एक युवक महल के पास नौ दिनों तक निर्जला उपवास रखकर तपस्या करने बैठ गया था। जब तत्कालीन महाराज को इसकी जानकारी मिली, तो उन्होंने युवक से तपस्या करने का कारण पूछा।

युवक ने बताया कि वह बस्तर दशहरा बिना किसी बाधा के शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न होने की कामना से साधना कर रहा है। युवक की श्रद्धा और संकल्प से प्रभावित होकर महाराज ने सिरहासार भवन का निर्माण करवाया और इस परंपरा को आगे बढ़ाने में सहयोग दिया। मान्यता के अनुसार, तभी से हर साल जोगी बिठाई की रस्म निभाई जाती है।

चार फीट गहरे गड्ढे में बैठकर करेंगे तपस्या

जोगी दौलत कुमार नाग के अनुसार, तपस्या शुरू करने से पहले मावली देवी मंदिर में पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद देवी की तलवार को लाकर करीब चार फीट गहरे गड्ढे में स्थापित किया जाता है। जोगी इसी गड्ढे में पालथी मारकर नौ दिनों तक साधना करते हैं।

इस परंपरा में जोगी को कठिन तपस्या करनी होती है। दौलत कुमार नाग ने बताया कि उनकी साधना निर्जला होती है, यानी इस अवधि में वे न तो भोजन करते हैं और न ही पानी पीते हैं। यह परंपरा बस्तर दशहरा के धार्मिक महत्व और स्थानीय लोगों की गहरी आस्था को दर्शाती है।

तीन साल से जोगी बन रहे हैं दौलत कुमार नाग

दौलत कुमार नाग ने बताया कि वह पिछले तीन वर्षों से जोगी की भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने अपनी तपस्या के उद्देश्य के बारे में कहा कि उनकी कामना है कि बस्तर दशहरा के दौरान खेती-बाड़ी अच्छी रहे और बस्तर के लोग सुख-शांति से जीवन बिताएं।

उनकी साधना केवल दशहरा पर्व के निर्विघ्न आयोजन की कामना तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें क्षेत्र की खुशहाली और किसानों की समृद्धि की प्रार्थना भी जुड़ी हुई है।

75 दिनों तक चलता है बस्तर दशहरा

बस्तर दशहरा देश के सबसे लंबे समय तक चलने वाले दशहरा आयोजनों में गिना जाता है। इसकी विभिन्न रस्में और धार्मिक अनुष्ठान कई सप्ताह तक चलते हैं। स्थानीय परंपराओं, जनजातीय संस्कृति और देवी आराधना से जुड़ा यह पर्व बस्तर की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

जोगी बिठाई की रस्म इस आयोजन की विशिष्टता को और बढ़ाती है। नौ दिनों तक चलने वाली यह साधना श्रद्धा, संकल्प और परंपरा के प्रति समर्पण का प्रतीक मानी जाती है।

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