ग्रीनलैंड पर अमेरिका की नजर बरकरार: जानें ट्रंप-डेनमार्क डिफेंस फ्रेमवर्क डील की पूरी कहानी और ताजा स्थिति

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ग्रीनलैंड को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। पिछले करीब एक साल से ट्रंप लगातार इस आर्कटिक द्वीप पर अमेरिकी नियंत्रण की मांग करते आ रहे हैं, और जरूरत पड़ने पर सैन्य बल के इस्तेमाल की धमकी तक दे चुके हैं। ग्रीनलैंड, डेनमार्क का अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है, जहां 2009 के एक समझौते के तहत रक्षा और विदेश मामलों की जिम्मेदारी डेनमार्क के पास है, जबकि बाकी घरेलू मामलों में द्वीप को स्वायत्तता हासिल है।

जनवरी 2026 में डावोस में हुए वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान ट्रंप ने नाटो महासचिव मार्क रूटे के साथ बातचीत के बाद एक “फ्रेमवर्क डील” की घोषणा की थी, जिसमें उन्होंने द्वीप को बलपूर्वक हथियाने की धमकी और यूरोपीय देशों पर टैरिफ लगाने की चेतावनी दोनों वापस ले ली थी। ट्रंप ने दावा किया था कि इस डील से अमेरिका को ग्रीनलैंड में “पूर्ण पहुंच” मिलेगी, जिसमें जितने चाहें उतने सैन्य ठिकाने बनाने की छूट शामिल है। इसका मकसद अमेरिका के बहुप्रतीक्षित “गोल्डन डोम” मिसाइल डिफेंस सिस्टम के एक हिस्से को भी वहां स्थापित करना बताया गया था।

हालांकि डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने साफ कर दिया था कि उनका देश अपनी संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं करेगा, और सुरक्षा से जुड़े मसलों पर बातचीत को ही एकमात्र रास्ता बताया। इस बीच मई 2026 में ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नील्सन ने कहा था कि बातचीत में प्रगति तो हो रही है, लेकिन अभी तक कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ है। अमेरिका पहले से ही 1951 की संधि के तहत ग्रीनलैंड में पिटुफिक स्पेस फोर्स बेस का संचालन करता है, जो आर्कटिक क्षेत्र में मिसाइल चेतावनी प्रणाली के लिए अहम माना जाता है।

रूस और चीन को आर्कटिक क्षेत्र से दूर रखने की रणनीति के तहत यह पूरा मामला अमेरिका और नाटो सहयोगियों के लिए एक अहम भू-राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है, और आने वाले महीनों में इस पर आगे की बातचीत जारी रहने की उम्मीद है।

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