वैज्ञानिकों ने बताया कि बुध का व्यास बनने के बाद करीब 23 किलोमीटर तक घटा हो सकता है, सतह पर दिखने वाली झुर्रियां खोल रही हैं ग्रह के अंदर का राज
नई दिल्ली। सौरमंडल का सबसे छोटा ग्रह बुध (Mercury) सिर्फ सूरज के सबसे करीब ही नहीं है, बल्कि वैज्ञानिकों के मुताबिक यह अरबों वर्षों से धीरे-धीरे सिकुड़ भी रहा है। अब सितंबर 2026 में सामने आई एक नई रिसर्च ने इस प्रक्रिया को लेकर वैज्ञानिकों को एक और महत्वपूर्ण सुराग दिया है।नई स्टडी के मुताबिक बुध के सिकुड़ने की मात्रा पहले लगाए गए अनुमानों से 10 से 30 प्रतिशत अधिक हो सकती है। सबसे बड़े अनुमान के मुताबिक, ग्रह के बनने के बाद उसके कुल व्यास में करीब 23 किलोमीटर तक की कमी आई हो सकती है।
किस वैज्ञानिक ने की रिसर्च?
इस नए अध्ययन का नेतृत्व गाकु निशियामा (Gaku Nishiyama) ने किया है। वह German Aerospace Center (DLR) के Institute of Space Research से जुड़े हैं और Hokkaido University तथा The University of Tokyo से भी संबद्ध हैं।रिसर्च टीम में Adrien Broquet, Nicola Tosi, Frank Preusker, Alexander Stark, Hauke Hußmann और Ernst Hauber जैसे वैज्ञानिक भी शामिल हैं। यह अध्ययन अमेरिकी American Geophysical Union (AGU) की पत्रिका Geophysical Research Letters में प्रकाशित हुआ है।
आखिर क्यों सिकुड़ रहा है बुध?
बुध के सिकुड़ने की कहानी उसके अंदर छिपी गर्मी से जुड़ी है। वैज्ञानिकों के अनुसार करीब 4.5 अरब साल पहले बनने के बाद से बुध का अंदरूनी हिस्सा धीरे-धीरे ठंडा होता गया।जैसे-जैसे ग्रह का आंतरिक भाग ठंडा हुआ, उसके अंदर का पदार्थ सिकुड़ता गया। इसका असर ऊपर मौजूद चट्टानी परत पर पड़ा और सतह पर दबाव पैदा हुआ। इसी वजह से बुध की सतह पर बड़े-बड़े रिज, झुर्रियां और लोबेट स्कार्प (lobate scarps) दिखाई देते हैं।इसे वैज्ञानिक एक आसान उदाहरण से समझाते हैं—जैसे किसी फल के अंदर का हिस्सा सूखकर सिकुड़ता है तो उसकी बाहरी सतह पर झुर्रियां पड़ जाती हैं, उसी तरह बुध के अंदरूनी हिस्से के सिकुड़ने से उसकी चट्टानी सतह पर संरचनाएं बनीं।
पहले वैज्ञानिक कम सिकुड़ने की बात क्यों मान रहे थे?
बुध की सतह पर लाखों-करोड़ों साल से उल्कापिंड और अन्य अंतरिक्षीय पिंड टकराते रहे हैं। इन टक्करों से बने क्रेटर और मलबे ने ग्रह की पुरानी सतह को काफी हद तक ढक दिया।नई रिसर्च में वैज्ञानिकों ने इसी समस्या को ध्यान में रखा। उनका निष्कर्ष है कि बुध की सतह पर सिकुड़ने के जो निशान दिखाई देते हैं, वे पूरी कहानी नहीं बताते। कई पुराने संकेत बाद में जमा हुए प्रभावों और सतही मलबे के नीचे छिप गए होंगे।
NASA के MESSENGER मिशन से मिली थी अहम जानकारी
इस रिसर्च में NASA के MESSENGER मिशन से मिले आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। MESSENGER ने 2011 से 2015 तक बुध की कक्षा में रहकर ग्रह की सतह और आंतरिक संरचना से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई थी।NASA की पिछली रिसर्च में भी बुध के सिकुड़ने के प्रमाण मिले थे। MESSENGER की तस्वीरों में छोटी और अपेक्षाकृत युवा fault scarps मिली थीं, जिससे संकेत मिला कि बुध का अंदरूनी हिस्सा ठंडा होने और ग्रह के सिकुड़ने की प्रक्रिया पूरी तरह अतीत की घटना नहीं हो सकती।
BepiColombo से खुलेगा और बड़ा राज
अब वैज्ञानिकों की नजर BepiColombo मिशन पर है। यह European Space Agency (ESA) और Japan Aerospace Exploration Agency (JAXA) का संयुक्त मिशन है।यह मिशन बुध की सतह का पहले से कहीं अधिक विस्तृत अध्ययन करने में मदद कर सकता है। वैज्ञानिक उम्मीद कर रहे हैं कि उच्च गुणवत्ता वाले नए आंकड़ों से बुध की सतह पर मौजूद छोटे स्कार्प, रिज और अन्य भूगर्भीय संरचनाओं को बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा और सिकुड़ने की नई गणनाओं की जांच होगी।
सिर्फ बुध ही नहीं, सौरमंडल को समझने में मददगार
वैज्ञानिकों के लिए बुध का सिकुड़ना सिर्फ एक ग्रह के आकार में बदलाव की कहानी नहीं है। इसके जरिए यह समझने में मदद मिल सकती है कि छोटे चट्टानी ग्रह समय के साथ कैसे ठंडे होते हैं और उनकी आंतरिक संरचना कैसे बदलती है।नई गणना यह संकेत भी देती है कि बुध के अंदर की गर्मी, उसके धात्विक कोर और ग्रह के शुरुआती निर्माण की परिस्थितियों को लेकर पुराने मॉडलों में अभी और सुधार की जरूरत हो सकती है। हालांकि, बुध के सिकुड़ने की सटीक मात्रा को लेकर भविष्य के बेहतर अवलोकन महत्वपूर्ण होंगे।यानी बुध अचानक सिकुड़ नहीं रहा है। यह अरबों वर्षों से चल रही बेहद धीमी भूगर्भीय प्रक्रिया है—और नई रिसर्च ने संकेत दिया है कि यह प्रक्रिया पहले समझे गए स्तर से कहीं अधिक बड़ी रही हो सकती है।