इंदौर के बाद अब उज्जैन भी कचरे को बनाएगा कमाई का जरिया, तीन परियोजनाओं से बदलेगी शहर की तस्वीर
मध्य प्रदेश में कचरा प्रबंधन को लेकर अब उज्जैन एक नई पहल की ओर बढ़ रहा है। शहर में अब नारियल के छिलके, पुराने जूते-चप्पल और जैविक कचरे को बेकार समझकर फेंकने के बजाय उनसे उपयोगी संसाधन तैयार करने की योजना बनाई गई है। उज्जैन नगर निगम तीन अलग-अलग कचरा प्रसंस्करण परियोजनाओं पर काम करने की तैयारी कर रहा है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य कचरे का बेहतर निपटान करने के साथ-साथ पुनर्चक्रण और ऊर्जा उत्पादन की संभावनाओं को बढ़ाना है।
महापौर मुकेश टटवाल की अध्यक्षता में मंगलवार को हुई मेयर इन काउंसिल (एमआईसी) की बैठक में इन तीनों परियोजनाओं के प्रस्तावों पर अनुशंसा की गई। अब संबंधित परियोजनाओं के लिए एजेंसियों के चयन और आगे की प्रक्रिया पर काम किया जाना है। यदि ये योजनाएं जमीन पर उतरती हैं, तो उज्जैन के कचरा प्रबंधन में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
1. नारियल के छिलकों से बनेंगे उपयोगी उत्पाद
उज्जैन में नारियल के छिलकों और उनसे निकलने वाले रेशों के पुनर्चक्रण के लिए अलग प्लांट स्थापित करने की योजना है। धार्मिक नगरी होने के कारण यहां पूजा-पाठ और धार्मिक गतिविधियों में नारियल का इस्तेमाल होता है। ऐसे में नारियल के छिलकों का सही तरीके से निपटान करना नगर निगम के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
नारियल के छिलकों से निकलने वाले रेशों को प्रसंस्कृत करके कई उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। नारियल के रेशों का इस्तेमाल रस्सी, चटाई, गमलों में उपयोग होने वाले माध्यम और कुछ अन्य उत्पाद बनाने में किया जाता है। हालांकि, उज्जैन के प्रस्तावित प्लांट में कौन-कौन से उत्पाद तैयार किए जाएंगे, इसकी अंतिम जानकारी अभी सामने नहीं आई है।
नगर निगम इस प्लांट के लिए एजेंसी चुनने की प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी कर रहा है। इसका उद्देश्य नारियल के कचरे को व्यवस्थित तरीके से एकत्रित करके उसे उपयोगी सामग्री में बदलना है।
2. पुराने जूते-चप्पल भी नहीं जाएंगे बेकार
इस योजना का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा पुराने जूते-चप्पलों का पुनर्चक्रण है। आमतौर पर खराब हो चुके जूते और चप्पल घरेलू कचरे के साथ फेंक दिए जाते हैं। इससे ऐसे कचरे की मात्रा बढ़ती है, जिसे सामान्य जैविक कचरे की तरह आसानी से विघटित नहीं किया जा सकता।
प्रस्तावित फुटवियर वेस्ट प्लांट में पुराने जूते-चप्पलों को उनकी सामग्री के अनुसार अलग करने और पुनर्चक्रण के लिए तैयार करने की व्यवस्था की जा सकती है। रबर, कुछ प्रकार के प्लास्टिक और अन्य पुनर्चक्रण योग्य हिस्सों का इस्तेमाल संबंधित प्रसंस्करण प्रक्रियाओं के माध्यम से दोबारा किया जा सकता है।
इससे लैंडफिल में पहुंचने वाले कचरे को कम करने और उपयोगी सामग्री वापस उत्पादन प्रक्रिया में लाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, उज्जैन में इस प्लांट की क्षमता, तैयार होने वाले उत्पादों और संचालन की समयसीमा अभी तय होना बाकी है।
3. डबरी गांव में जैविक कचरे से बनेगी कंप्रेस्ड बायोगैस
तीसरी परियोजना उज्जैन जिले की घट्टिया तहसील के डबरी गांव में प्रस्तावित है। यहां जैविक कचरे से कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) बनाने के साथ-साथ पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को अलग करने के लिए सीबीजी सह मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (एमआरएफ) प्लांट स्थापित करने की योजना है।
यह परियोजना स्वच्छ भारत मिशन 2.0 के तहत सार्वजनिक-निजी भागीदारी यानी पीपीपी मॉडल पर प्रस्तावित है।
इस व्यवस्था में उपयुक्त जैविक कचरे को प्रसंस्कृत करके बायोगैस तैयार की जा सकती है। निर्धारित शोधन और संपीड़न प्रक्रिया के बाद इसका इस्तेमाल उपयुक्त ईंधन संबंधी जरूरतों के लिए किया जा सकता है।
दूसरी ओर, एमआरएफ केंद्र में कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में छांटा जाता है। इससे कागज, धातु, प्लास्टिक और दूसरी पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को सामान्य कचरे से अलग करके आगे उपयोग के लिए भेजा जा सकता है।
इस परियोजना की सफलता के लिए नियमित रूप से कचरा उपलब्ध होना, उसका सही पृथक्करण और प्लांट का प्रभावी संचालन महत्वपूर्ण होगा।
तीनों परियोजनाओं को लेकर क्या हुआ फैसला?
नगर निगम की एमआईसी बैठक में तीनों परियोजनाओं के प्रस्तावों पर अनुशंसा की गई है। नारियल के छिलकों और फुटवियर वेस्ट के पुनर्चक्रण प्लांटों के लिए एजेंसी चयन के उद्देश्य से ई-निविदा आमंत्रित करने के प्रस्ताव पर भी अनुशंसा हुई है।
इसका मतलब है कि परियोजनाएं अभी तैयारी और प्रक्रिया के चरण में हैं। इन्हें पूरी तरह शुरू हो चुकी योजनाओं के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। प्लांट कहां और कितनी क्षमता के साथ स्थापित होंगे, कितनी लागत आएगी तथा संचालन कब शुरू होगा, इन सवालों पर आगे की प्रक्रिया के दौरान स्पष्टता आएगी।
कचरे से कमाई की योजना से उज्जैन को क्या फायदा होगा?
इन परियोजनाओं का सबसे बड़ा संभावित फायदा यह है कि कचरे को केवल हटाने या जमीन में दबाने के बजाय उससे उपयोगी सामग्री और ऊर्जा तैयार करने की दिशा में काम होगा।
- कचरे में कमी: पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को अलग करने से लैंडफिल तक पहुंचने वाले कचरे की मात्रा कम हो सकती है।
- संसाधनों का दोबारा इस्तेमाल: नारियल के रेशों, रबर और कुछ प्रकार के प्लास्टिक जैसी सामग्री का उपयोग दोबारा किया जा सकता है।
- ऊर्जा उत्पादन: डबरी में प्रस्तावित सीबीजी परियोजना से उपयुक्त जैविक कचरे को ईंधन में बदलने की संभावना है।
- रोजगार के अवसर: प्लांटों की स्थापना और संचालन से स्थानीय स्तर पर काम के अवसर पैदा हो सकते हैं, हालांकि रोजगार की संख्या अभी स्पष्ट नहीं है।
- बेहतर स्वच्छता: कचरे के अलग-अलग प्रकार के लिए अलग व्यवस्था होने से उसका संग्रहण और निपटान अधिक व्यवस्थित हो सकता है।
बैठक में सड़क और सफाई से जुड़े प्रस्ताव भी आए
एमआईसी बैठक में अन्य प्रस्तावों पर भी चर्चा हुई। सड़क चौड़ीकरण और निर्माण से प्रभावित 25 मुआवजा प्रकरणों में 2 करोड़ 47 लाख रुपये की अनुशंसा की गई। इसके अलावा एन-कैप मद से दो सीएनजी रोड स्वीपिंग वाहन खरीदने और तीन वर्ष तक उनके संचालन एवं रखरखाव के लिए एजेंसी चयन के प्रस्ताव पर भी अनुशंसा की गई।
ये प्रस्ताव शहर की सफाई व्यवस्था और आधारभूत सुविधाओं को बेहतर बनाने से जुड़े हैं। इनके क्रियान्वयन की स्थिति संबंधित स्वीकृतियों और आगे की प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
इंदौर के बाद उज्जैन की पहल पर नजर
इंदौर ने स्वच्छता और कचरा प्रबंधन के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। अब उज्जैन भी कचरे को संसाधन में बदलने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। नारियल के छिलकों, पुराने जूते-चप्पलों और जैविक कचरे के लिए अलग-अलग व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव इसी दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
हालांकि, किसी भी कचरा प्रबंधन परियोजना की असली सफलता उसके प्रस्ताव में नहीं, बल्कि जमीन पर होने वाले काम में दिखाई देती है। नियमित कचरा संग्रहण, नागरिकों की भागीदारी, तकनीकी व्यवस्था और प्लांटों का लगातार संचालन ही तय करेगा कि उज्जैन कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलने के लक्ष्य को कितनी सफलता से हासिल कर पाता है।