नेपाल त्रासदी: हटो नहीं, डरो नहीं, बढ़े चलो!

नेपाल त्रासदी: हटो नहीं, डरो नहीं, बढ़े चलो!
(नेपाल सरकार, वहां की सेना, पुलिस, समस्त समाजसेवी संगठनों, विदेशी सरकारों और भारत सरकार को समर्पित)

अद्भुत और अकल्पनीय हिमालय तथा प्रकृति की लीला हमारी समझ से परे है। कल जब मेरी बड़ी भाभीजी ने एक लेख पढ़ने के लिए भेजा और उस पर मेरे अनुभव लिखने को कहा, तो लगा कि क्या लिखूं और क्या छोड़ूं। पिछले तीन दिनों से लगातार टीवी, समाचार पत्रों और सोशल मीडिया पर आ रहे नेपाल त्रासदी के दृश्य मन-मस्तिष्क से निकल ही नहीं रहे। इस आपदा में जिन्होंने अपनों को खोया है और जो भीषण पीड़ा झेल रहे हैं, उनके दर्द को मैं गहराई से महसूस कर सकती हूं।

प्रकृति के इस भयानक रूप को देखकर यही समझ आता है कि उसके सामने हम सब नतमस्तक हैं। हम विकास की चाहे कितनी भी ऊंचाइयां छू लें, लेकिन प्रकृति के मिजाज को समझ पाना मानव के बस में नहीं है।

हिमालय का सम्मोहन और पुरानी स्मृतियां
नेपाल की इस घटना ने मुझे हिमालय और उसकी तलहटी में की गई मेरी तमाम यात्राओं की याद दिला दी। वास्तव में, मैं खुद को बहुत भाग्यशाली मानती हूं कि इतनी कठिन यात्राओं के बाद सकुशल घर वापस लौट सकी। प्राचीन समय में जब लोग तीर्थयात्रा पर जाते थे, तो एक तरह से सबसे पूर्ण विदाई लेकर ही निकलते थे। अगर कोई सकुशल लौट आता था, तो घर वाले ‘मावंद’ जैसा बड़ा धार्मिक आयोजन करते थे। इसका अर्थ यही था कि हिमालय की ओर जाने वाले श्रद्धालु इस मानसिक तैयारी से जाते थे कि शायद वे लौटकर न आएं।

आखिर ऐसा क्या है हिमालय में? क्या यह अपनी ओर खींचता है? मैं पूरी निष्ठा से कह सकती हूं कि हां, यह खींचता ही है! जिसने एक बार हिमालय के सम्मोहन को महसूस कर लिया, वह खुद को रोक नहीं सकता।

अपनी पिछली यात्राओं पर नज़र डालती हूं, तो कॉलेज के दिनों की यादें ताज़ा हो जाती हैं। १९८२ में कॉलेज की ओर से आयोजित नेपाल टूर से शुरू हुआ यह सिलसिला भूटान, लद्दाख, तिब्बत, हिमाचल, अमरनाथ, कश्मीर और मानसरोवर तक अनवरत चलता रहा। २००४, २००६, २०१०, २०१२, २०१३, २०१५, २०१९, २०२३, २०२४ की यात्राएं और ईश्वर ने चाहा तो आगामी अक्टूबर २०२६ की योजना—ये सभी इस बात की गवाह हैं कि बर्फ से ढकी हिमालय की चोटियां आपको बार-बार अपने पास बुलाती हैं। लेकिन आज, इस त्रासदी के दौर में, हमें गहरे आत्ममंथन की आवश्यकता है।

 

मेरी पहली सोलो यात्रा: मणिमहेश (सितंबर २०१६)
४ सितंबर २०१६ को मैं पहली बार अकेले (सोलो) यात्रा पर मणिमहेश गई थी। उस वक्त देहरादून की एक युवा शोधकर्ता मोनिका, जो एक पर्यावरण प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी, उसने मुझसे कहा था— “आंटी, मैं इस ट्रैक पर प्रतिदिन जाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या का अध्ययन कर रही हूं, ताकि सरकार द्वारा आवश्यक सुविधाओं का बेहतर ढांचा तैयार किया जा सके।”

चंबा से आगे बढ़ते हुए प्रकृति के विहंगम दृश्य मन मोह रहे थे। भरमौर के पास हड़सर से मणिमहेश झील तक की पैदल दूरी लगभग १४ किलोमीटर की सीधी चढ़ाई है। उस दुर्गम रास्ते पर चलते हुए सतत यह डर बना रहता था कि कहीं लैंडस्लाइड (भूस्खलन) न हो जाए। इन यात्राओं में पहाड़ों से छोटे पत्थरों का खिसकना आम बात है, क्योंकि हिमालय का बड़ा हिस्सा मिट्टी और ढीली चट्टानों से बना है।

बारिश, फिसलन और कीचड़ से भरे संकरे रास्तों पर चलना, दो पहाड़ों के बीच बने लकड़ी व लोहे के अस्थायी पुलों को पार करना बेहद खौफनाक होता था। मन में यही भय रहता था कि अगर यहां से ज़रा भी चुके, तो नीचे बहती उफनती नदी में हमारा अता-पता भी नहीं चलेगा। फूलों की घाटी, गुंजी, गाला, लिपुलेख दर्रा और रेत के पहाड़ों पर गाइड के कदम से कदम मिलाकर चलना… वह सब आज भी आंखों के सामने तैर जाता है। धन्छो से मणिमहेश झील के पास, रात भर होती मूसलाधार बारिश के बीच टेंट में केवल नीचे बहते पानी के ऊपर तिरपाल, एक पतली गद्दी और कंबल बिछाकर बिताई रातें याद करती हूं, तो लगता है कि सचमुच ईश्वर की कृपा ही थी जो सुरक्षित लौट आई।

पुनर्निर्माण और जिजीविषा: ‘बढ़े चलो, बढ़े चलो’
आज नेपाल सरकार, वहां की सेना, पुलिस, समाजसेवी संगठन और अंतर्राष्ट्रीय मदद के बल पर परिस्थितियां धीरे-धीरे नियंत्रण में आ रही हैं। आज नहीं तो कल, नेपाल फिर से अपने पैरों पर मजबूती से खड़ा होगा; क्योंकि आपदाओं के सामने हार न मानना ही मनुष्य की मूल प्रवृत्ति है।

ऐसे संकट के समय मुझे कवि सोहनलाल द्विवेदी जी की वे पंक्तियां याद आती हैं, जो हमें हर मुसीबत से लड़कर आगे बढ़ने का हौसला देती हैं:

न हाथ एक शस्त्र हो,

न हाथ एक अस्त्र हो,

न अन्न वीर वस्त्र हो,

हटो नहीं, डरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो।

रहे समक्ष हिम-शिखर,

तुम्हारा प्रण उठे निखर,

भले ही जाए जन बिखर,

रुको नहीं, झुको नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो।

डॉ. अभया आर. जोगलेकर, प्राचार्य, बी.पी. लोधी स्नातकोत्तर शासकीय महाविद्यालय, आरंग, छत्तीसगढ़

अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं। इससे सहमत या असहमत होना पाठकों का व्यक्तिगत अधिकार है। यह लेख जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से है, यह किसी भी प्रकार की पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।

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