पारंपरिक भारतीय थाली: पोषण, परंपरा और स्वाद का वैज्ञानिक संगम

पारंपरिक भारतीय थाली: पोषण, परंपरा और स्वाद का वैज्ञानिक संगम

बचपन से ही घर में होने वाले हरेक उत्सवों में खाना परोसते /खाते समय अक्सर माँ और दादी कहती थी की थाली में बाएं तरफ परोसे जनि वाली खाद्य वस्तु को बाएं तरफ ही परोसो तथा दाहिने तरफ वाली वास्तु को दायीं तरफ परोसो ,गलत परोसे जाने पर हमेशा डांट और ठीक से परोसने की हिदायत मिलती थी। उस वक़्त परंपरागत थाली का महत्त्व समझ नहीं आता था पर गृहविज्ञान विषय के माध्यम से समझ आया की इनका क्या महत्त्व है ,आज की पीढ़ी को भारतीय ज्ञान परंपरा की जानकारी देना आवश्यक है अतः यह लेख आपके लिए लिख रही हूँ , महाराष्ट्रियन होने के नाते मैंने हमेशा इसे सबसे उत्तम थाली कहा है क्योंकि यह न केवल संतुलित है अपितु मात्रा के दृष्टिकोण से भी सही है।

पारंपरिक भारतीय थाली केवल भोजन परोसने की एक सामान्य प्लेट नहीं है, बल्कि यह हमारे पूर्वजों द्वारा विकसित पोषण, स्वाद, पाचन और स्वास्थ्य का एक संपूर्ण एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। परंपरागत भारतीय थाली शरीर, मन और आत्मा को समान रूप से पोषित करने के सिद्धांत पर आधारित है। इसमें कार्बोहाइड्रेट (रोटी और चावल), पूर्ण प्रोटीन (दाल और चावल का संयोजन), आवश्यक वसा (घी या तेल का तड़का), तथा विटामिन, खनिज और फाइबर (सब्जी, सलाद और कोशिम्बिर) का सटीक संतुलन होता है, जो शरीर की दैनिक पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करता है।

भारतीय आहार विज्ञान के अनुसार, एक परिपूर्ण थाली में षड्रस यानी छह स्वादों का समावेश होता है—मधुर (अनाज, गुड़), अम्ल/खट्टा (दही, अचार), लवण/नमकीन (पापड़, नमक), कटु/तीखा (मसाले, हरी मिर्च), तिक्त/कड़वा (हरी पत्तेदार सब्जियाँ, हल्दी), और कषाय/कसैला (छाछ, धनिया, कच्चा सलाद)। यह छहों स्वाद व्यक्ति को शारीरिक तृप्ति देने के साथ-साथ पाचन रसों के स्राव को बढ़ावा देते हैं और मानसिक संतुष्टि प्रदान करते हैं।

थाली में बाई तरफ परोसजने वाला रायता जिसमे कभी भुनी हुई मूंगफली डाली जाती है कभी भिगीहुई मुंग दाल मिलाकर कोशिम्बीर बनाई जाती है तो कभी दही मिलाकर तड़का दिया जाता है। यह आँतों के स्वस्थ के लिए उत्तम है क्योंकि पारंपरिक फर्मेंटेड खाद्य पदार्थ जैसे दही और छाछ आंतों के स्वास्थ्य (Gut Health) के लिए लाभदायक प्रोबायोटिक्स प्रदान करते हैं और दालें प्रोटीन की पूर्ती करते हैं। थाली में मौसम के अनुसार सुखी चटनियाँ भी परोसी जाती हैं -कभी तील(कैल्शियम ,प्रोटीन और फैट से भरपूर ),कभी फ्लेक्स सीड(ओमेगा -३ और लिग्निन से पूर्ण ) ,कभी मूंगफली(प्रोटीन फैट और विटामिन इ युक्त ), कभी गीली चटनियाँ भी परोसी जाती हैं -कभी नारियल (मैंगनीज ,कॉपर और फैट से भरपूर ),कभी पुदीना (मेंथोल ,विटामिन सी ,एंटीऑक्सीडेंट ,लौ कैलोरी से पूर्ण ) ,कभी आम या टमाटर (विटामिन सी ,ल्य्कोपीन ,एंटीऑक्सीडेंट युक्त ) । थाली की संरचना में निम्बू की मात्रा भी शामिल होती है ,जो आहार को पचने में मदत करती है साथ ही विटामिन सी का स्रोत भी है। मौसम के अनुसार अचार भी होते है जो खमीरीकृत होने से गट स्वास्थ्य के लिए अच्छे होते है।

थाली में प्रयुक्त छोटी-छोटी कटोरियाँ ( १ भाग सुखी फल वाली सब्जी का ,१ भाग हरी पत्तेदार साग का (खट्टी मीठी ),१ भाग कढ़ी ,१ भाग दाल के साथ रोटी और १ भाग चावल )स्वाभाविक रूप से भोजन की मात्रा (Portion Control) को नियंत्रित करने में मदद करती हैं, जिससे अति-भोजन से बचाव होता है। इसके अलावा, थाली में स्थानीय और मौसमी सामग्रियां शामिल होती हैं, जो न केवल पर्यावरण के अनुकूल हैं, बल्कि प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाकर पुरानी बीमारियों के जोखिम को कम करती हैं।

संक्षेप में हम कह सकते हैं की , पारंपरिक भारतीय थाली यह साबित करती है कि हमारी पारंपरिक खान-पान की आदतें अत्यंत वैज्ञानिक, टिकाऊ और बिना किसी आधुनिक सप्लीमेंट के संपूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करने में सक्षम हैं।

डॉ. अभया आर. जोगलेकर, प्राचार्य, बी.पी. लोधी स्नातकोत्तर शासकीय महाविद्यालय, आरंग, छत्तीसगढ़

 

अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं। इससे सहमत या असहमत होना पाठकों का व्यक्तिगत अधिकार है। यह लेख जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से है, यह किसी भी प्रकार की पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।

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