हमारी पीढ़ी: विरासत और रिश्तों का पुल कौन बनाएगा?

हमारी पीढ़ी

कुछ दिन पहले अखबार में एक लेख पढ़ रहा था. लेखक ज़ेन जी जनरेशन की बात कर रहे थे. समाज शास्त्रियों ने तमाम पीढ़ियों को अलग अलग समय के मुताबिक़ नाम दे दिए हैं. अचानक मन ने पूछा : तुम किस पीढ़ी के हो ? हाँलाकी यह प्रश्न अप्रत्याशित था. मैंने अपने आप को सयन्मित किया और मन को बताने लगा: मैं उस पीढ़ी में शामिल हूँ जिसका जन्म आज़ादी के बाद हुआ है. ये वो पीढ़ी है जिसने आज़ादी को अपने माँ बाप , बाबा-दादी , नाना – नानी की नज़रों से देखा. इस पीढ़ी ने आज़ादी की लड़ाई ख़ुद तो नहीं लड़ी लेकिन उसके क़िस्से ख़ूब सुने हैं. ये पीढ़ी गवाह है सामाजिक न्याय के लिए हुए तमाम संघर्षों की, प्रजातंत्र के उत्थान की, आर्थिक विकास के लहर की, औद्योगिक क्रांति की, शिक्षा के प्रचार प्रसार और विस्तार की और यूँ कहें कि भारत की बदलती हुई तस्वीर की.

इस पीढ़ी ने परिस्थितियाँ को बदलते देखा हैं, बदलते मूल्यों को जिया हैं, अनेक नई विचारधारों को गले लगाया है. सच कहूँ तो इस पीढ़ी ने बदलाव और उससे उपजे अन्तद्वंद को आत्मसात् किया है. आगे बदने की आग लिए इस पीढ़ी ने नए भारत की नींव रखी. मन थोड़ी देर खामोश रहा और फिर मुस्करा कर बोला तुम्हारी पीढ़ी ने नई पीढ़ी को क्या दिया.

यकायक मुझे कुछ नहीं सूझा. मन ने फिर एक दस्तक दी “क्या रिश्तों और सामाजिक ताने बाने को नई पीढ़ी तक पहुचाया ?” मुझे लगा कि हमारी एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी थी. ज़िम्मेदारी पुल बनाने की. एक ऐसा पुल जिससे हमारी विरासत, हमारी संस्कृति, हमारे मूल्य, हमारी सोच, हमारे विचार और हमारीतमाम धरोहर नई पीढ़ी तक पहुँच सके, पुरानी पीढ़ीऔर नई पीढ़ीके बीच सामंजस्य बन सके. हमें एक सेतु का निर्माण करना था ताकि हमरी विकास यात्रा नये आयाम तो छुए लेकिन सनातनी व्यवस्था भी कदम से कदम मिला कर चल सके. विकास की इस यात्रा में भारत की गौरवशाली अतीत की झलक तो दिखे लेकिन विश्व की तमाम विकास यात्रा से प्रेरणा लेने की विनम्रता रहे, मध्य क़ालीन भारत में वैज्ञानिक सोच और प्रगति के अभाव को स्वीकारने की झिझक ना हो.

लेकिन फिर अंदर से आवाज आई कि क्या तुम इस कसौटी पर खरे उतर पाए हो. क्या कुछ बात है जो इस पीढ़ी से नज़रअंदाज़ हो गई. मैं खामोश हो गया. तब दिल धीरे से बोला कि तुमने नई पीढ़ी को पुराने रिश्तों से बहुत कम रूबरू कराया. या यूँ कहें कि यह तुम्हारी प्राथमिकताओं में बहुत पीछे था.

सही तो बोल रहा था दिल. हमने अपने जीवन काल में रिश्तों को बहुत क़रीब से देखा है. प्रायःहम में से बहुतों ने दादा दादी, नाना नानी, मौसा मौसी चाचा चची, बुआ फूफा, ताऊ ताई जैसे रिश्तों को बहुत नाजकदीक से देखा ही नहीं जिया भी है. लेकिन शायद हमारी नई पीढ़ी को इन रिश्तों के एहसास से वंचित रहना पड़ा है. आर्थिक उदारीकरण, बाज़ारवाद, उपभोक्तावाद जैसी तमाम बातों ने ज़िंदगी की रफ़्तार को इतना तेज कर दिया है हमने पारिवारिक रिश्तों की अहमियत को भुला सा दिया. फलस्वरूप आज की पीढ़ी भी अपनी परंपराओं और रिश्तों से दूर हो गयी है. जो मूल्य जो संस्कार जो विरासात हमें सहजता से मिल गयी थी उसे नई पीढ़ी तक पहुचाने में हमें संघर्ष करना पड़ रहा है, जद्दोजहद करनी पड़ रही है. क्या यह विकास की क़ीमत है जो हमें चुकानी होगी या फिर हम कुछ कर सकते हैं.

गुजरा समय तो वापस आ नहीं सकता. अब प्रयास करने होंगे ताकि हम नई पीढ़ी को रिश्तों के ताने बाने की अहमियत समझा पाएँ. रास्ता कठिन जरूर है पर ना मुमकिन नहीं. बच्चों को अपने पारिवारिक कार्यक्रमों में ले जाना ,अपने रिश्तेदारों के साथ छुट्टियाँ बिताने का कार्यक्रम बनाना, डिजिटल प्लेटफार्म में परिवार को जोड़ना जैसे प्रयास शायद भूले रिश्तों को जीवंतता दे पायें. कहीं ना कहीं दिल के कोने में हम सब लोग इस बात की कसक महसूस कर रहे हैं लेकिन बोल नहीं पा रहे हैं. आइये , हम अपनी इस ज़िम्मेदारी को निभाने के लिए कदम बढ़ायें तभी हमरी पीढ़ी अपने सामाजिक दायित्व को निभाने के लिए याद रखी जाएगी.

– चैतन्य वेंकटेश्वर, भिलाई, छत्तीसगढ़

 

अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं। इससे सहमत या असहमत होना पाठकों का व्यक्तिगत अधिकार है। यह लेख जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से है, यह किसी भी प्रकार की पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है।

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